लघुकथाएँ : अंकुश्री // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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अंकुश्री

सरकार और पत्नी

अपनी खर्चीली पत्नी के कारण पति भविष्य के लिये कुछ बचा नहीं पा रहा था. पत्नी के खर्च से तंग आकर पति ने बचत का एक नया तरीका निकाला. पति ने अपने जिम्मे का खर्च बढ़ा-चढ़ा कर पत्नी को बताना शुरू किया. अपने खर्च के नाम पर पत्नी से वह अच्छी रकम ऐंठने लगा. पति का उपाय कारगर साबित हुआ. वह हर महीने कुछ बचत करने लगा.

पति को बचत की ललक थी तो पत्नी को फिजूलखर्ची की आदत. पति की बचत का पत्नी की फिजूलखर्ची पर असर पड़ना स्वाभाविक था.

एक दिन पत्नी ने पति से कहा, ‘इधर तुम्हारे जिम्मे होने वाले खर्च का बिल बहुत बढ़ने लगा है. इतना बड़ा-चढ़ा कर खर्च मत किया करो.’ आदेशात्मक लहजे के बाद पत्नी ने आगे शिकायती लहजे में कहा, ‘मैं कोई सरकार तो हूं नहीं कि कम हो या अधिक, बस बिल चाहिये. सरकार और पत्नी में कुछ तो भेद रखा करें.’

स्पीडमनी

‘मेरा काम हो गया,’ आवेदक ने किरानी बाबू से पूछा.

बाबू आवेदक को अपने टेबुल के पास आया देख काम में व्यस्त हो गये थे. उन्होंने टेबुल पर से फाईल उठाकर अलमीरा में रखी. आलमीरा का कागज ड्रॉअर में और ड्रॉअर का कुछ सामान टेबुल पर रख दिया.

किरानी बाबू के व्यस्त हो जाने पर आवेदक ने दुबारा टोका, ‘मैंने जो आवेदन दिया था, वह.....’

‘आवेदन कब दिया था?’ किरानी बाबू की आवाज में झुंझलाहट थी.

‘डेढ़ महीने हो गये,’ आवेदक ने विनम्रतापूर्वक कहा, ‘मैंने वर्मा जी के पास अपना आवदेन जमा किया था.’ उसका इशारा कोने में बैठे दिनचर्या लिपिक की ओर था.

‘केवल आवेदन पत्र ही उन्हें दिया था या और कुछ?’

‘और कुछ क्या?’

‘आपने स्पीडमनी नहीं दी थी क्या?’

‘स्पीडमनी? यह क्या होती है?’ आवेदक के चेहरे पर नासमझी का भाव दिखाई दे रहा था.

‘डेढ़ महीने हो गये और आपका आवेदन पत्र उनके टेबुल से मेरे टेबुल तक नहीं पहुंच सका!’

‘हां! बहुत विलंब हो चुका है. कृपया आप कोई उपाय कीजिए ताकि.....’

‘देखिये आपका आवेदन अभी मेरे पास नहीं पहुंचा है. यदि वर्मा जी आपका आवेदन दो-तीन महीने में मुझे दे भी देते हैं तो मेरे पास इतने आवेदन पड़े हुए हैं कि आपका आवेदन आगे बढ़ाने में साल भर तो लग ही जायेगा.’ किरानी बाबू फिर से व्यस्त हो गये.

‘मेरे आवेदन पत्र को आगे बढ़ाने में इतने दिन लग जायेंगे? मैं तो समझ रहा था कि दो-तीन दिनों में सारा काम हो जायेगा. लेकिन आप तो बता रहे हैं कि.....’

‘आपका अंदाज सही है. लेकिन मैं भी गलत नहीं बता रहा हूं.’

‘लेकिन आप तो साल भर के बाद काम पूरा होने की बात कह रहे हैं.’

‘बिना स्पीडमनी के यदि उतने दिनों में भी काम पूरा हो जाये तो यह कार्यालय वालों की कृपा ही समझेंगे.’ किरानी बाबू फिर से व्यस्त हो गये.

आवेदक ने जेब से दस-दस के तीन नोट निकालकर किरानी बाबू की ओर बढ़ा दिये. नोट देखते ही किरानी बाबू ने कहा, ‘आप कल अपराह्न में आयें. इस बीच आपका काम पूरा हो जायेगा.’

किरानी बाबू उसी क्षण स्पीड में आ गये.

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