लघुकथाएँ : शालिनी गोयल // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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शालिनी गोयल

भय

सीमा ट्यूशन सेंटर से बाहर आई तो देखा रोड लाइट्स जल चुकी थीं. आज उसे ज्यादा ही देर हो गयी थी। जब भी सेंटर में मीटिंग होती उसे देर हो ही जाती, मगर आज समस्या ये थी कक ऑटो और बस की आज हड़ताल थी और उसे पदैल ही अपने घर तक जाना था। आज ठण्ड और दिनों से कुछ ज्यादा ही थी, शायद इसीलिए सड़क पर आवाजाही कम थी। सीमा ने तेज तेज कदमों से चलना शुरू किया। छोटी सड़क पर मुड़ी तो अचानक उसे अपने पीछे किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। सड़क दूर तक वीरान थी, इसीलिए सीमा अनजाने भय से डर गयी। उसके पीछे की पदचाप उसे अपने कुछ नजदीक आती हुई महसूस हुई तो उसने कुछ और तेज चलना शुरू कर दिया। ‘माँ सही कहती हैं, वाकई मैं लापरवाह हूं. आज फिर फोन घर भूल आई , अगर पास होता तो अभी नरेश भैया को फोन कर के बुला लेती।’ सीमा मन ही मन बुदबुदाई।

अब तो सामने घर की गली थी, मगर कल ही किनारे जलने वाला एक मात्र बल्ब भी बच्चों के निशाने में आ गया था। इसलिए गली भी अंधेरे में डूबी थी. सीमा ने सोचा अगर पीछे वाले व्यक्ति ने जरा भी कुछ कहा तो वो शोर मचा देगी, गली में कोई न कोई तो निकल ही आएगा। ‘अरे! सीमा रुक, आगे गहरा गड्ढा है, आज ही पाइपलाइन ठीक करने वाले आये थे उन्होंने सारा खोद डाला है, मैं मोबाइल से टॉर्च दिखाता हूँ, आ जा मेरे साथ.’ ये आवाज पड़ोस में रहने वाले गीता काकी के बेटे नरेश भैया की थी, जिन्हें सीमा बचपन से राखी बांधती थी. सीमा को यूं लगा जैसे किसी ने उसे जीवनदान दे दिया हो। ‘मैं तुझे इतनी देर से पकड़ने की कोशिश कर रहा हूं, मगर तू तो एक्सप्रेस ट्रैन की तरह भाग रही है, क्या बात है? सब ठीक है? ‘भैया ने सीमा से पूछा। ‘हाँ भैया सब ठीक है, वो आज ठण्ड ज्यादा है, और मुझे देर भी हो गयी है, बस इसीलिए जल्दी-जल्दी चल रही थी, घर पर माँ इन्तजार में होंगी।’ सीमा ने जवाब दिया। सीमा ये सोचने पर मजबूर हो गयी कि हम कैसे युग में जी रहे है जहाँ अपने पीछे आने वाले कदमों की आहट भी किसी लड़की को भयभीत करने के लिए काफी है, चाहे पीछे आने वाला उसका भाई ही क्यूं न हो।

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