बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : सतीश राठी // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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जन्म- 23 फरवरी 1956 इंदौर (म.प्र.)

उपलब्धियां- लघुकथा संग्रह, कविता संग्रह प्रकाशन, क्षितिज एवं मनोबल

संपादन- लघुकथा संकलन, व्यंग्य संकलन

सम्पर्क सूत्र- आर- 451, महालक्ष्मी नगर, इंदौर- 452010 (म.प्र.),

सतीश राठी

कन्सल्टेंसी

मेहरा जी की पत्नी को दिल का दौरा पड़ा. उनके दोनों लड़के डॉक्टर, लेकिन दोनों अमेरिका में सेटल्ड.

पड़ोसियों के सहयोग से उन्होंने तुरंत पत्नी को शहर के बड़े अस्पताल में भरती करवाया.

हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर पुत्र को उन्होंने फोन पर सूचना दी तो लड़के ने आने में अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा- "पापा. यहां बहुत व्यस्तता है. मैं अभी अस्पताल के डॉक्टर से फोन पर सम्पर्क कर लेता हूँ और फिर यहाँ से इंटरनेट पर कंसल्ट करता रहूँगा. आप चिंता मत करें, मां ठीक हो जायेगी." कुछ ऐसा ही जवाब छोटे का भी था. आने में असमर्थता उसकी भी थी.

बुढ़ापे में मेहरा जी ने कमर कस ली और पत्नी की सेवा में लग गए. दोनों डॉक्टर लड़के रोज फोन एवं इंटरनेट पर बात करते और डॉक्टर से कन्सल्ट करते रहे.

उनकी यह इंटरनेटी सेवा रंग लाई और माँ स्वस्थ हो गई. पत्नी को घर वापस लाकर मेहरा जी ने बड़े लड़के को फोन लगाया और यह सूचना दी. वह फोन पर खुशी से चीखा- "देखो पापा! माँ ठीक हो गई ना. देखा आपने मेरी इंटरनेट कन्सल्टेंसी का कमाल."

इधर मेहरा जी भी कुछ नहीं बोल पाए उनकी आँखों से दो अंश्रु बूंदें टेलीफोन के चोगे पर टपक गईं.

जन्मदिन

"सुनो! अपना गोलू आज एक साल का हो गया है." गोलू के मुँह में सूखा स्तन ठूँसते हुए सुगना ने अपने चौकीदार पति से कहा.

"तुम्हें कैसे याद रह गया इसका जन्मदिन?" चौकीदार का प्रश्न था.

"उसी दिन तो साहब की अल्सेशियन कुतिया ने यह पिल्ला जना था, जिसका जन्मदिन कोठी में धूमधाम से मनाया जा रहा है." ठंडी साँस लेते हुए सुगना बोली.

साईकल

"सर, मेरा सायकल का लोन आज स्वीकृत हो जाता तो मेहरबानी हो जाती." कमर से पूरा झुककर और वाणी में विनम्रता समेटकर रघु चपरासी ने सक्सेना साहब से कहा.

"अरे तेरी सायकल से पहले तो मेरी सायकल का ऋण स्वीकृत करवाना है." मसखरी के स्वर में सक्सेना ने कहा.

"साब, आप तो कार से आते जाते हैं आपको सायकल की क्या जरूरत. सायकल तो हम जैसे गरीबों के लिए हैं." रोज पाँच किलोमीटर पैदल चलकर आने का दर्द रघु के बोलने के पीछे दबा हुआ था.

"अरे, तेरी सायकल नहीं पागल. मुझे तो व्यायाम वाली सायकल खरीदना है. देखता नहीं यह...." अपनी मोटी तोंद की और उन्होंने इशारा किया.

"हमारा पेट तो परिवार का पेट पालने की चिंता में ही अंदर हो जाता है साब।"

मुंहलगे रघु का चिंता भरा स्वर सुन सक्सेना जी खिसियाहट से भर गये.

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