लघुकथाएँ : देवेन्द्र कुमार मिश्रा // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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देवेन्द्र कुमार मिश्रा

जन्म : 21 मार्च 1973

उपलब्धियां : 7000 से अधिक कवितायें, 30 कहानियां प्रकाशित, 18 कथा संग्रह प्रकाशित, 35 काव्य संग्रह प्रकाशित, सम्मन : देशभर की साहित्यिक संस्थाओं से 320 सम्मान-पत्र.

संपर्कः पाटनी कॉलोनी, भरत नगर, चन्दनगांव- छिन्दवाड़ा

(म.प्र.), पिन- 480001,

देवेन्द्र कुमार मिश्रा

भीड़ का रेला

एक भीड़ का रेला आया. उसके मुखिया ने पूछा- ‘गाय क्या है?’

उसने कहा- ‘गाय एक दुधारू पशु है.’

मुखिया ने कहा- ‘गाय हमारी माता है. तुमने उसे पशु कहा. मारो साले को.’

और भीड़ उसे तब तक कूटती रही. जब तक कि वह मर नहीं गया. भीड़ फिर आगे बढ़ी. मुखिया ने एक और व्यक्ति से पूछा- ‘गंगा क्या है?’

उसने कहा- ‘एक पवित्र नदी है.’

मुखिया ने गुस्से में कहा- ‘गंगा माता है. तुमने उसे नदी कहा. मारो साले को.’

और भीड़ ने उसे इतना मारा कि मरा समझकर छोड़ दिया. भीड़ फिर आगे बढ़ी. एक और आदमी को पकड़ा और मुखिया ने कहा- ‘बोलो भारत की जय.’

उसने कहा- ‘ठीक है, लेकिन फिलहाल मुझे काम पर जल्दी जाना है. और ये इस समय क्या सवाल करने लगे?’

मुखिया ने गुस्से में कहा- ‘मारो साले को.’ और भीड़ ने उसे पीट-पीटकर मार डाला.

एक आदमी यह सब देख रहा था. उसने गलती से गुस्से में कह दिया- क्या तुम जब कहोगे तभी हम देशभक्त कहलायेंगे. कोई जय नहीं. कोई माता नहीं. ये जबरदस्ती बर्दास्त नहीं की जायेगी. मैं देशभक्त होने का ढिंढोरा नहीं पीट सकता. मैं समय पर टैक्स भरता हूं. संविधान का पालन करता हूं. कोई गलत काम नहीं करता. तुम सब से बड़ा देशभक्त हूं.’

मुखिया ने गुस्से में कहा- ‘मारो इसे. ये न जय कहता है न माता मानता है. फिर ये मुसलमान है. पक्का आतंकवादी है. मारो साले को.’

भीड़ ने उसकी हत्या कर दी.

इसके बाद भीड़ अपने मुखिया के साथ गौरक्षा के नाम पर धर्म के नाम पर चंदा मांगने लगी. जिसने दिया ठीक. जिसने नहीं दिया उसे आतंकी, पाकिस्तानी कहकर पिटाई शुरू कर दिया. भीड़ थक गई तो मुखिया ने कहा- ‘चलो थकान उतारने के लिए पार्टी करते हैं. फिर शराब-शबाब और कबाब का दौर चलने लगा.’

दोगलापन

उसने चाइना को अपशब्द कहे. चाइना की नीतियों को जी भर के कोसा. उसके बाद उसने चाइना मेड मोबाइल निकाला और मोबाइल पर फोन लगाकर कहा- ‘चाइना के विरोध में वाट्स अप मैसेज किया है. ग्रुप में सभी लोगों तक पहुंचा देना.’

मैंने कहा- ‘ये क्या बात हुई? विरोध भी और चाइना का मोबाइल भी.’

उसने कहा- ‘देशभक्ति और मोबाइल में अंतर होता है.’

मैंने उसे हिकारत की दृष्टि से देखा और वह मेड इन चाइना मोबाइल पर चाइना विरोधी बातें करते हुए चला गया.

भविष्य

प्राइवेट स्कूल, नर्सरी का बच्चा. उम्र ढाई साल भारी-भरकम बस्ता. जो बच्चा उठाता तो वह गिर जाता बस्ते के साथ. सो पिता ने बेटे का बस्ता उठाया और अंगुली पकड़कर स्कूल पहुंचे. शिकायत की शिक्षक से. इतनी कम उम्र, छोटी क्लास के बच्चे ऊपर इतना बोझ. इतना भारी बस्ता. इतनी सारी किताबें.

शिक्षक ने कहा- ‘सर बोझा उठाने की आदत भी स्कूल की पढ़ाई के अंतर्गत ही आती है. आप कोशिश करें कि बच्चा अपने बस्ते का बोझ स्वयं उठाये. बोझ उठाने की आदत पड़ जायेगी तो बच्चा न कभी विद्रोह कर सकेगा. न अपराध करने की सोचेगा. नौकरी नहीं लगी तो बोझ उठाने का काम उसे कुशल श्रमिक तो बना ही देगा. हमें ही देखिये एम.एस.सी., बी.एड., पी.एच.डी. सब हैं, लेकिन इस प्राइवेट स्कूल में चार हजार मासिक की नौकरी में जीवन का बोझ उठा ही रहे हैं न.’

और पिता से उत्तर देते न बना. वे शिक्षक के उत्तर पर प्रश्नवाचक निगाहों से देख रहे थे स्वयं को, बच्चे के भविष्य को.

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