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लघुकथाएँ : // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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अशोक अंजुम

संपर्कः गली-2, चन्द्र विहार कॉलोनी

(नगला डालचंद) क्वारसी बाईपास, अलीगढ़-202002


अशोक अंजुम

डाकू

अभी कुछ दिन पहले ही डाका पड़ा था बजरंगी के घर. डाकू सारा माल लपेट ले गए थे, जमकर पिटाई की थी सो अलग.

जैसे-तैसे कहीं से जुगाड़ करके आज वो लगभग दो सप्ताह के बाद फिर फुटपाथ पर अपने प्लास्टिक के सामान के साथ आ पहुंचा था. ‘हर माल दस रुपये में’ की आवाज आज पहले की अपेक्षा क्षीण थी. अभी उसकी बोहनी भी नहीं हुई थी कि तभी नगर निगम की गाड़ी दनदनाती हुई आई और उसमें से तेजी से चार-पांच कर्मचारी फुटपाथ की तरफ लपके. बजरंगी अपना सामान समेट पाता तब तक उस पर कर्मचारियों ने कब्जा जमा लिया था.

‘स्सालों को रोज-रोज....सारा शहर कचरा-घर बनाकर रख दिया है.’ पांचों में से एक गुर्राया.

सामान लपेटकर नगर निगम की गाड़ी में रख लिया गया. गाड़ी चल दी. बजरंगी रोता-गिड़गिड़ाता रहा, घर के लोगों के भूखों मर जाने की दुहाई देता रहा, लेकिन उसकी गिड़गिड़ाहट गाड़ी की आवाज में दबकर रह गई. वह फुटपाथ पर माथा पकड़कर बैठ गया.

उधर नगर-निगम की गाड़ी में माल का बँटवारा हो रहा था. ‘ये मग्गे तू ले ले!’....‘मेरे घर तो बाल्टियों की जरूरत है!’...‘ये तसले मैं ले लेता हूं.’ ‘ये मैं....’

इधर बजरंगी के दिमाग में डाकुओं और नगर निगम के कर्मचारियों के चेहरे घुलमिल रहे थे.

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