गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : मृदुला श्रीवास्तव // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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मृदुला श्रीवास्तव

जन्म : 14 जून, 1964

उपलब्धियां : पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन, लघुकथाएं, व्यंग्य कथाएं तथा समीक्षा प्रकाशित।

हिमालय अपार्टमेंट,

(गोल्डी जनरल स्टोर के पास ), कसुम्पटी,

शिमला - 171009,

मृदुला श्रीवास्तव

ब्रांडेड

सरोजिनी नगर की मार्किट के कोने में बने उस कांच के विशाल शोरूम में घुसने से पहले उसने सोचा क्यूँ न शोरूम से कुछ दूरी पर खड़े जूते बेचते उस रेहड़ी वाले से भी जूतों का रेट पूछ लिया जाए। जूते बनावट में बढ़िया लग रहे थे, बिल्कुल शोरूम में लगे जूतों के डिजाइन जैसे ही।

‘कितने का है भैया ये ?’ ‘छह सौ पचास का।’

‘क्यूं लूट रहे हो ?’ ‘नहीं साब। खुद मेरा अपना बनाया हुआ है। बस 100 बचेंगे इसमें मुझे।’

‘नहीं नहीं, ठीक लगाओ।’ टाई वाले ने उससे कहा। ‘नहीं नहीं साब, पटरा नहीं बैठेगा। वो जो सामने वाले शोरूम में जितने भी जूते लगे देख रहे हो न साब जी, उन्हें भी मैंने और मेरे बेटों ने ही बनाया है।’

‘‘छोड़ यार, तू क्या खाकर बनाएगा? वो तो ब्रांडेड शोरूम है। इतने सुन्दर जूते तूने बनाए होते तो यहाँ रेहड़ी लगा रहा होता? ठीक लगा दाम।’ ‘नहीं साब बस 500 तक का लगा सकता हूँ।’

‘छोड़, 600-700 ही देने है तो वो शोरूम का जूता क्या बुरा है ?’ ‘आपकी जैसी मर्जी साब।’

‘‘चल छोड़ मुझे नहीं लेना।’’ कहता हुआ वह सामने फिक्सड प्राइस के बोर्ड वाले उसी शोरूम की सीढ़ियों पर गजब की अकड़ से चढ़ गया।

‘ये क्या ओरिजनल ब्रांडेड शूज हैं?’ ‘यस सर डेफिनेटली।’ ‘आर यू श्योर’ ‘यस सर, यू नो इन अवर शॉप लाइक अवर कंटरी एवरी थिंग इज ब्रांडेड सर। हाँ जैसे ये जो विग आपके सिर पर लगी है वो भी ब्रांडेड है। यस यस सर- आपने ठीक समझा... कहते हुए दोनों खिल खिलाने में व्यस्त हो गए। और फिर देखते ही देखते जूते बिक गये.

ब्राडेंड कंपनी के नकली टैग वाले डिब्बा बंद उन जूतों को, शानदार क्वालिटी के कैरी बैग में सिकन्दर बन झुलाता वह कार की पिछली सीट पर पैकेट को फेंक पांच मिनट के भीतर स्टेयरिंग घुमाता वहाँ से निकल लिया, बिना यह जाने कि शोरूम के मालिक ने हमेशा की तरह इन जूतों को भी पिछले ही महीने उसी ठेले वाले के जूते बनाने की वर्कशाप से मात्र 400 रुपये जोड़ी, थोक में खरीदा था । न कोई सौदेबाजी, न कोई चिक चिक, न कोई झिक झिक।

एलईडी की रोशनी में चमचमाते, प्लास्टिक के स्टैंड पर खड़े दूसरे जूते सामने भागती उसकी गाड़ी को पीछे से अंगूठा दिखाने में व्यस्त थे। लेकिन रेहड़ी वाले के चेहरे पर उतरती चढ़ती गर्दिश की उन ब्रांडेड लकीरों को पढ़ने का समय शायद किसी के पास नहीं था।

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