गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : किशोर श्रीवास्तव // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

किशोर श्रीवास्तव

जन्म स्थान : पूर्वी चंपारन (बिहार)

प्रकाशन : विभिन्न विधाओं की लगभग 13 पुस्तकें प्रकाशित, अनेक सरकारी पत्र-पत्रिकाओं का संपादन. गायन, चित्रकला, रंगमंच आदि का शौक.

संपर्कः फ्लैट सं. 321, सै. 4, आर. के. पुरम, नई दिल्ली-110022,


किशोर श्रीवास्तव

जिगर के टुकड़े

नगर में मासूम बच्चों की लगातार हो रही अपहरण की घटनाओं से कामकाजी पति-पत्नी परेशान थे। वे अब अपने मासूम बच्चे को नौकरानी के भरोसे घर में अकेला छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहते थे। इसी कारण वे दो-चार दिन छुट्टी पर भी रहे। पर ऐसे कब तक चलता। समस्या का समाधान ढूंढ़ती पत्नी को आज अपना संयुक्त परिवार तोड़कर अलग रहने पर कोफ़्त महसूस हो रही थी। अगर उसने अपने सास-ससुर को वापस गांव जाने पर मज़बूर न किया होता और जेठ-जिठानी से लड़-झगड़ कर उन्हें अलग मकान लेकर रहने पर मज़बूर नहीं किया होता तो कम से कम आज उसे इस तरह की समस्या का सामना तो नहीं करना पड़ता।

काफी सोच-विचार के बाद रात में सोते समय पत्नी, पति के कानों के पास आकर धाीरे से फुसफुसाई, ‘क्यों न अम्मा-बाबू जी को फिर से गांव से बुला लिया जाए। जब तक अपना बेटा थोड़ा बड़ा नहीं हो जाता, हम उन्हें अपने पास ही रखते हैं।’

पत्नी की बातें पति को जंच गईं। अगले ही दिन उसने अम्मा-बाबू को पत्र लिखा, ‘अम्मा-बाबूजी, नादानी में आकर हमने आप लोगों को गांव तो भेज दिया पर सच तो यही है कि आप दोनों के बगैर हम लोग ज़्यादा समय तक रह ही नहीं सकते। आप लोग हमें क्षमा कर दें और हमारे पास वापस आ जाएं। मैं यहां से अपने किसी परिचित को आप लोगों के पास भेज रहा हूं। आप लोग उसी के साथ यहां चले आयें। आपकी बहू भी पश्चाताप् की आग में जल रही है।’

बेटे का पत्र पाकर विपन्न अवस्था में अकेले रह रहे मां-बाप के चेहरे खिल उठे। वे बुदबुदाये, ‘भला, वे हमारे बगैर रह भी कैसे सकते थे। कोई पराये तो हैं नहीं, आखिर हैं तो हमारे अपने ही.. हमारे जिगर के टुकड़े...।

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