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लघुकथाएँ : माधव नागदा // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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जन्म- 20 दिसंबर 1951, लाल मादड़ी (नाथद्वारा), राजस्थान

उपलब्धियां- चार कहानी संग्रह, दो लघुकथा संग्रह, एक कविता संग्रह और एक डायरी विधा की पुस्तक. राजस्थानी में भी दो पुस्तकें प्रकाशित.

सम्पर्क : लाल मादड़ी (नाथद्वारा)-313301 (राज.)

माधव नागदा

भक्त

दोनों भक्त मंदिर प्रांगण में खड़े थे. पहला कुछ देर तक मंदिर की भव्यता और मूर्ति की सौम्यता को निहारने के बाद बोला, "इसके निर्माण में मैंने रात-दिन एक कर दिये. पिछले दिनों यह नगाड़ा सेट लाया हूं. बिजली से चलने वाला. अरे भाई, आज के जमाने में बजाने की झंझट कौन करे?" फिर स्विच ऑन करते हुए कहा, "लो सुनो! तबीयत बाग-बाग हो जायेगी." बिजली दौड़ते ही नगाड़े, ताशे, घड़ियाल, शंख सभी अपना-अपना रोल अदा करने लगे. पहला हाथ जोड़कर झूमने लगा. दूसरा मंद-मंद मुस्करा रहा था. जब पहले के भक्ति भाव में कुछ कमी आई तो दूसरे ने बताया, "उधर मैंने भी एक मंदिर बनाया है. आज अवसर है, चलो दिखाता हूँ."

यह मंदिर और भी अधिक भव्य था. विद्युत नगाड़ा सेट यहां भी था. दूसरा बोला, "इसके साथ ही मैं तुम्हें एक और जोरदार चीज दिखाता हूं जो हिंदुस्तान में अभी तक कहीं नहीं है."

उसने जेब से रिमोट कन्ट्रोल निकाल कर बटन दबाया. देखते ही देखते जो पुजारी निज मंदिर में निश्चल खड़ा था, हरकत में आकर मूर्ति की आरती उतारने लगा. साथ ही फिजां में स्वर गूंज उठे, "ओम जय जगदीश हरे..."

दूसरे भक्त का सिर गर्व से उन्न्त हो गया.

मेरा वजूद

यह मेरी प्रथम प्रेम अनुभूति थी. फिजाओं में किसी के आँचल की खुशबू घुल गई थी. बदन फूल-सा हल्का लगता था और मस्तिष्क मानो नशे में सराबोर. कानों में हरदम रुनझुन घंटियाँ बजा करती थीं, उसकी खिलखिलाहट की मानिंद. एक दिन मैंने उसे किसी अजनबी के साथ सनराइज रेस्तरां में देखा. बाँहों में बांहें डाले. मुझे काटो तो खून नहीं. वो मिली तो मैंने अपनी शिकायत स्पष्ट रूप से दर्ज की, "वह तुम्हारा क्या लगता है? इस तरह तुम उसके साथ...!"

"वह बहुत अच्छा शायर है. मैं उसे प्यार करती हूँ."

"और मुझे?" मैंने तिलमिलाकर पूछा.

"तुम्हें भी." उसने सहज भाव से उत्तर दिया. तब मैंने तय किया कि मैं भी शायरी करूंगा. नज्मों और नगमों में अपना दिल उंड़ेलकर रख दूंगा.

दूसरे सप्ताह एक और अपरिचित उसका साथी था. मौका पाकर मैंने पूछा, "और यह?"

"इससे भी मैं प्यार करती हूँ. चित्रकार है. मेरा न्यूड बनाया है. सच्ची में एकदम मार्वेलस. घर आना तुम्हें दिखाऊंगी."

"मेरा अब तुम्हारे घर आना नामुमकिन है." मेरा दिल बैठ रहा था. मुझे लगा कि मैं दिल का मरीज हूँ.

"ओह डियर, तुम भी क्या छोटी-छोटी बातों पर रूठ जाते हो." उसने मुझे गले लगाते हुए कहा. मैं उसकी मीठी-मीठी बातों में बह गया. मेरी आँखों के सम्मुख तूलिका और केनवास और कई-कई प्रकार के रंग थिरकने लगे. मैं भी चित्रकार बनूँगा, मैंने तय किया.

कुछ समय पश्चात् शाम के झुटपुटे में वह एक बार फिर किसी और के साथ दिखाई दी, ऐसे मूड में गोया वह उसका बरसों पुराना दोस्त हो.

इस बार मैं उसका सामना नहीं कर सका और पार्क के अँधेरे कोने में खिसक गया. मैंने तय किया कि मैं अब कुछ और बनने की बजाय वही बना रहूँगा जो मैं हूँ.

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