बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : केसरी प्रसाद पांडेय ‘वृहद’ // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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केसरी प्रसाद पांडेय ‘वृहद’

संपर्कः 527/25 ए, अर्जण नगर, न्यू जगदंबा कॉलोनी, जबलपुर (म.प्र.), पिन- 482002,

केसरी प्रसाद पांडेय ‘वृहद’

चौकीदार

अब वह संयुक्त परिवार नहीं रह गया था. एक दिन था जब यह गांव का परिवार बखरी में रहता था. दो-दो आंगन, लंबी-चौड़ी बखरी थी फिर भी रहने के लिए कम पड़ जाती थी. अब शहर में स्थानांतरित हो गया था यह परिवार और गांव की बखरी में रह गए थे बूढ़े बरगद के समान बूढ़े बाबा.

बस किसी शादी-ब्याह में ही सब के सब इकट्ठे होते और जहां-तहां से बखरी में चले आते. शादी-ब्याह संपन्न होने के बाद जो जहां से आता वहीं चला जाता. एक बूढ़े-बाबा भर रह जाते और अनुमान लगाते कि अब-कब किसकी शादी होगी और मेरे परिवार के लोग कब यहां आएंगे इकट्ठा होकर.

आज तक किसी ने उन बूढ़े बाबा से शहर चलने के लिए नहीं कहा और उन्होंने भी किसी से शहर चलने की चिरौरी नहीं की. आज भी एक शादी संपन्न हुई थी और शहरी एक-एक कर धीरे-धीरे बखरी से रवाना होते जा रहे थे. अंत में एक युवा आया और दादा के चरण छूकर बोला- ‘दादा श्री अब मैं भी चलता हूं. आपका पोता हूं अमेरिका में नौकरी करता हूं. मेरी शादी में आपको अमेरिका ले चलूंगा दादाजी.’

वृद्ध की मुंदी आखों में एकाएक चमक सी पैदा हो गई. उन्हें लगा कि वह भी एक जिम्मेवार आदमी है और उनका भी एक वजूद है. अभी तक तो वह स्वयं को बखरी का एक चौकीदार ही समझ रहे थे.

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