लघुकथाएँ : प्रदीप शशांक // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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प्रदीप शशांक

जन्म : 27 जून, 1955

कृतियां : विभिन्न संग्रहों में रचनाएं सम्मिलित. प्रतिनिधि लघुकथायें जबलपुर में सह संपादक. 2009 में ‘अजनबी’ लघुकथा संग्रह प्रकाशित.

संपर्कः 37/9, श्रीकृष्णम् ईको सिटी, माढ़ोताल, जबलपुर-482002 (म.प्र.)

प्रदीप शशांक

विखंडित न्याय

हाईकोर्ट के चक्क्र लगाते-लगाते उसे चक्कर आने लगे थे. विगत पांच वर्षों से उसका प्रकरण हाईकोर्ट में लंबित था. पेशी-दर-पेशी सुबह से शाम तक वकीलों के आगे-पीछे घूमने के बाद भी पेशियां बढ़ती ही जाती थीं- कभी जज साहब नहीं हैं, कभी विपक्ष का वकील नहीं है, कभी उसका स्वयं का वकील अनुपस्थित है. विगत पांच वर्षों से वह हजारों रुपये वकीलों के चक्कर में बर्बाद कर चुका था, लेकिन उसके प्रकरण पर कोई सुनवाई शुरू ही न हो सकी.

अब जैसे-तैसे सुनवाई शुरू हुई ही थी कि वकीलों की हड़ताल... हाईकोर्ट विखंडन की खबरें...बचाओ...टुकड़े करो....पक्ष-विपक्ष की अपीलें! वकीलों द्वारा न्यायालय का बहिष्कार.

वह सोचने लगा- ‘हाईकोर्ट बचे या विखंडित हो उसे इससे क्या लेना और उसके जैसे हजारों पीड़ितों को तो बस इस बात की चिंता है कि उनका केस जल्द से जल्द निपट जाए.’

लेकिन कैसे?

पुरस्कार

आज ही परेश को अपने वरिष्ठ अधिकारी से निलंबन पत्र प्राप्त हुआ था. उसके ऊपर आरोप लगाया गया था कि उसने वरिष्ठ अधिकारी के आदेश की अवहेलना की थी तथा अपने कार्य के प्रति लापरवाही बरती थी.

हां, आरोप शत-प्रतिशत सही थे. वह वरिष्ठ अधिकारी के दबाव के समक्ष झुका नहीं था. वे उसे गलत कार्य करने के लिये मजबूर कर रहे थे. सुरेश ने उनका आदेश मानने से स्पष्ट इंकार कर दिया था.

वह ईमानदारी और लगन के साथ अपना कार्य करना चाहता था, लेकिन उसे कदम-कदम पर भ्रष्टाचारी तंत्र के चक्रव्यूह में उलझ पड़ता था. वह उस तंत्र को तोड़ने की हर बार नाकाम कोशिश करता था.

हाथ में निलंबन पत्र लिये वह सोच रहा था कि उसकी ईमानदार कोशिशों का इससे बड़ा पुरस्कार और क्या हो सकता है.

ज़िन्दगी

सड़क के किनारे चिथड़ों में लिपटा एक छह वर्षीय बालक कुत्ते के नवजात बच्चे के साथ फुटपाथ पर खेल रहा था. अचानक कुत्ते का बच्चा सड़क के दूसरी ओर भागा, तेजी से आ रही कार के ब्रेक चरमराये और वह कार के नीचे आते-आते बचा. कार कुछ आगे बढ़ी और वापस मुड़कर फुटपाथ पर खड़े उस लड़के के पास आकर रुकी, जिसके पास कुत्ते का बच्चा खड़ा हुआ था. कार में से एक मेमसाब उतरीं और उन्होंने कुत्ते के बच्चे को उठाकर गोद में लिया एवं कार में जाकर बैठ गईं. कार पुनः अपनी मंजिल की ओर बढ़ गयी.

फुटपाथ पर उपस्थित लोगों के शब्द थे- "कुत्ते के पिल्ले की जिन्दगी बन गई." किन्तु उस लड़के की आंखें एकटक जाती हुई कार की दिशा में देख रही थीं और उन आंखों में कुछ सवाल तरल रूप में तैर रहे थे. वे आंखें जैसे कह रही हों- ‘काश! कुत्ते के बच्चे की जगह कोई उसे भी गोद में उठाकर ले जाता तो शायद उसकी भी जिन्दगी बन जाती.

मजबूरी

बारात धूमधाम से आगे बढ़ रही थी. बारात में शामिल लड़के प्रत्येक चौराहे पर लगभग आधा घंटे तक डांस कर रहे थे.

डिस्को लाइट सिर पर उठाये रमिया बहुत बेचैनी महसूस कर रही थी. वह मन ही मन सोच रही थी- ‘ये लड़के जल्दी-जल्दी आगे क्यों नहीं बढ़ रहे हैं. बारात जितनी जल्दी लड़की वालों के घर पहुंचे उसे मुक्ति मिले. आज सुबह से ही उसके लड़के की तबीयत बहुत खराब थी. उसे उसके लिये दवा ले जानी थी. मजदूरी जल्दी मिल जाती तो वह शीघ्र ही दवा लेकर घर पहुंच जाती. उसके बुढ़ापे का सहारा उसका लड़का ही तो है जिसे वह अपना पेट काटकर पढ़ा रही है.’

बारात मंथर गति से आगे बढ़ रही थी और उसे चिन्ता भरी घबराहट हो रही थी. चिन्ता के कारण वह मन ही मन बड़बड़ाने लगी- ‘क्या ये नाचने कूदने वाले लड़के किसी दूसरे की मजबूरी को महसूस नहीं कर सकते?’

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