बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : रघुवीर अम्बर // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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रघुवीर अम्बर

उपलब्धियां : अनेकानेक पत्रिकाओं में शायरी/गजलें प्रकाशित

प्रकाशन : विभिन्न विधाओं में... अब लघुकथा लेखन का भी शुभारंभ.

संपर्कः डयू नं. 7, गणेश पार्क के सामने, कचनार सिटी,

विजयनगर, जबलपुर (म.प्र.),

रघुवीर अम्बर

साकार-निराकार

मैं पूरी तरह से भाव विभोर हो मां दुर्गा देवी के सम्मुख होकर दर्शन लाभ ले रहा था. अपने बुढ़ापे के लिए कुछ मांगता, इसके पहले पुजारी जी की तेज कर्कश आवाज ने चौंका दिया.

‘अरे कन्याओं को निमंत्रित किया है कि नहीं. ठीक समय से उन्हें कन्या भोजन कराना है- याद रहे.’

मुझे लगा कि देवी मां पुजारी पर तंज कस रही हैं- ‘बड़ा आया कन्या भोजन कराने वाला. खुद की पत्नी का तो गर्भपात करा दिया, ताकि कन्या प्राप्ति से बचा जा सके. कन्या, भोजन जैसे आडम्बरों के अपने पाप से बच जाएगा क्या यह?’

‘मां, क्या यह आपकी आवाज है’- मैं चौंककर बोला.

‘अवश्य. सृष्टि का अमूल्य उपहार है कन्या का जन्म, सृष्टि चलाती भी यही है. उन्हीं के साथ यह अन्याय हो रहा है. मुझ निराकार को पूजने के बदले साकार देवियों की अनदेखी हो रही है. कितना वीभत्स है यह क्यों?

‘मैं समझा नहीं माते!’

‘निराकार की पूजा और साकार की अवहेलना, अनदेखी और अन्याय, क्या ये सब संवेदनहीनता नहीं है.’

मैं देवी मां की चिंतामुक्त वाणी समझकर बोला- ‘माते, आदमी की आंखें तो कब की मुंद चुकी हैं. उनमें सत्य देखने का माद्दा ही नहीं रह गया है.’ मैं अपरोक्ष रूप से देवी मां की मूर्ति से आंसू गिरते महसूस कर रहा था.

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