लघुकथाएँ : डॉ. पूरन सिंह // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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डॉ. पूरन सिंह

जन्म : 10 जुलाई, 1964

प्रकाशन : तीन कहानी संग्रह, तीन लघुकथा संग्रह, वचन, 100 लघुकथाओं का संग्रह, सुराही एवं कविता संग्रह.

संपादन : कहानियां 18, 18 कहानीकार.

संपर्कः 240, बाबा फरीदपुरी, वेस्ट पटेल नगर,

नई दिल्ली-110008,

डॉ. पूरन सिंह

मैं चुप नहीं रहूंगी

शारदा ने अपने पति से आज तक कभी कुछ नहीं कहा. चाहे उसके बेटों ने कोई गलती की हो या फिर उसकी बेटी ने. उसके मायके वालों ने कुछ कहा हो या फिर ससुराल वालों ने, हमेशा दोष उसे ही दिया गया. किसी भी काम के बिगड़ने पर उसके पति उसे ही गलत ठहराते और वह चुपचाप सहन करती रहती. कभी कुछ नहीं बोलती, लेकिन अंदर ही अंदर कुछ टूटता रहता, बिखरता रहता. उसे कई बार तो ऐसा लगा कि अपनी जान ही दे दे, फिर सोचती शायद औरत की जिंदगी में यह सब कुछ होता ही है, इसमें नया क्या है. कितनी ही बार तो उसके पति ने उससे कहा भी- ‘क्या शारदा, तुम कभी पलटकर जवाब भी नहीं देती. इतना चुप रहना ठीक नहीं है. मुझे भी लगता है कि मैं तुम्हें व्यर्थ ही डांटता रहता हूं. कई बार तो तुम्हारा दोष भी नहीं होता है. सच, तुम बहुत अच्छी हो.’

लेकिन शारदा हमेशा चुप रहती.

अभी पिछले महीने वह बहुत बीमार हो गयी. उसके बेटे, बेटी और पति परेशान होने लगे. कोई दवा काम नहीं करती. तभी उसके पति को लगा कि दवा के साथ-साथ दुआ भी करनी चाहिए सो मंदिर चले गए और भगवान के आगे प्रार्थना की और घर आकर शारदा से बोले, ‘शारदा आज मैंने भगवान से तुम्हारे लिए प्रार्थना की है देखो, तुम जानती हो कि मैं कभी मंदिर नहीं जाता लेकिन तुम्हारे लिए मैं आज मंदिर गया था. जानती हो, मैंने आज भगवान से क्या मांगा?’

शारदा कुछ नहीं बोली सिर्फ अपने पति को देखती रही थी.

‘तुम पूछोगी नहीं कि मैंने क्या मांगा.’ पति ने शारदा के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा था.

शारदा ने आंखों ही आंखों में अपने पति से कह दिया- ‘बताओ आखिर क्या मांगा?’

‘मैंने भगवान से मांगा कि हे प्रभु अगले जन्म में भी तुम मुझे शारदा को ही देना, उन्हें ही मेरी पत्नी बनाना और हो सके तो जनम-जनम तक शारदा ही मेरी पत्नी बने. तुम देखना शारदा भगवान मेरी जरूर सुन लेंगे.’ पति ने अपनी आस्था व्यक्त की थी.

‘और अगर भगवान ने तुम्हारी प्रार्थना सुन ली तो मैं समझूंगी कि दुनिया में भगवान है ही नहीं.’ शारदा पहली बार चिल्लाकर बोली थी ऐसा लगा था जैसे ज्वालामुखी फट पड़ा था, ‘क्यों मांगा तुमने मुझे जनम-जनम के लिए. इस जनम में तुमने जो मुझे दिया, पहले उसके बारे में सोचते तब जनमों की बात करते. स्वार्थी कहीं के.’ शारदा अब भी हांफ रही थी उसके पति उसके लिए प्रार्थना ही की थी लेकिन वह बुरा क्यों मान गई?

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