बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : डॉ. मधुकांत // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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जन्म- 11 अक्टूबर 1949

उपलब्धि- अब तक 94 पुस्तकें प्रकाशित

सम्मानित- गांव की ओर, जग एक चिड़ियाघर, ब्लड बैंक, कन्या भ्रूण कृतियां, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला के द्वारा सम्मानित

विशेष- श्रेष्ठ शिक्षक का पुरस्कार प्राप्त.

डॉ. मधुकांत

पत्रों का संघर्ष

प्रिय विकेश, नमस्कार. तुम्हारे पत्र का जवाब देने की स्थिति में नहीं था. तुम तो जानते हो कि पत्नी हमेशा से साहित्य को पसंद नहीं करती. तुम्हारी पीड़ा भी मैं समझ सकता हूँ. पिछले एक मास से चाय-पानी और सिगरेट को बंद कर दिया. पत्रिका के लिए एक हजार रुपया बच गया और स्वास्थ्य में लाभ हुआ. रकम अपके खाते में डाल दी है. पत्रिका के इस अंक को निकालो. आगामी अंकों के लिए विज्ञापन जुटाने का संघर्ष कर रहा हूं..।

पत्र पढ़कर विकेश अवाक् खड़ा रह गया. उसे अपने दोनों पत्रों की इबारत अक्षरशः दिखाई देने लगी.

पहला पत्र.....

प्रिय अमर, नमस्कार. लघुपत्रिका निकालना कितना कठिन कार्य है. ‘प्रज्ञा’ को निकालते दस वर्ष हो गये. प्राइवेट नौकरी और परिवार के बढ़ते खर्च...लगता है पत्रिका बंद करने का निर्णय लेना पड़ेगा. कहिए क्या विचार है?...तुम्हारा विकेश.

दूसरा पत्र.....

प्रिय अमर नमस्कार. मैं जानता हूँ कि कुछ खत ऐसे होते हैं जिनका जवाब नहीं होता. निर्णय किया था पत्रिका का यह अंतिम अंक निकालकर पत्रिका बंद कर दूंगा. परंतु इस अंक का भी जुगाड़ नहीं हो रहा है दोस्त...खैर...तुम्हारा विकेश.

वैलेंटाइन डे

"हैलो लीवा...कैसी हो...?"

"तुम्हीं को याद कर रही थी."

"सो स्वीट, जरा बताओ तो किसलिए."

"कल वैलेंटाइन डे है. सोच रही थी कैसे सेलीब्रेट किया जाए, बस यादगार बन जाए..."

"लाल गुलाब"

"नहीं नहीं सब करते हैं. समथिंग न्यू यार!"

"ओ.के. सुनो... नया आइडिया...कल ब्लड बैंक में जाकर साथ-साथ रक्तदान करेंगे..."

"वाह...कमाल...तुम्हारी फ्रैंड बनने पर मुझे गर्व है..."

"तो ठीक है कल दस बजे ब्लड-बैंक में वैलेंनटाइन डे मनाएंगे..."

"एक-दूसरे को लाल-लाल सुंदर खून का उपहार देंगे, जो किसी भी अंजान जीवन की रक्षा करेगा."

सैल-फोन दोनों ओर से शांत हो गया.

परंतु दिल उमंग से भरकर उछाले मारने लगा.

पहली लड़ाई

उसे अच्छी प्रकार याद है, बचपन में वह ऊँची-ऊँची दीवारों के बीच घिरी प्रथम तल की छत पर नीचे पतंग उड़ाता था. उसकी छत के आसपास कोई पतंग उड़ जाती तो वह तुरंत अपनी पतंग को डुबका लेता था.

उस दिन आकाश बिल्कुल साफ था और आसपास कोई पतंग भी नहीं उड़ रही थी. उसने अपनी पतंग को ऊंचे आकाश में छोड़ दिया. पहली बार अपनी पतंग को इतना ऊँचा उड़ता देखकर उसका मन रोमांचित हो गया.

अचानक उसके पीछे से एक बड़ी पतंग निकल कर आयी. वह घबरा गया. वह किसी भी प्रकार अपनी पतंग को बचा नहीं सकता था. अचानक आए ख्याल से वह उत्साहित हो गया और उसने अपनी पतंग को साधा.

दोनों पतंग आकाश में खूब लड़ी और अंत में उसकी पतंग कट गयी. पतंग तो उसकी कट गयी, फिर भी वह उस दिन उत्साहित था. अपनी पहली लड़ाई लड़ने का दंभ उसके चेहरे पर थिरक रहा था. उसी दिन से वह दूसरे तल पर चढ़कर पतंग उड़ाने लगा.

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