लघुकथाएँ : डॉ. गीता गीत // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

clip_image002

डॉ. गीता गीत

उपलब्धियां : कहानी संग्रह, कविता संग्रह एवं लघुकथा संग्रह, हिन्दी

साधक-आराधक (परिचय ग्रंथ) तथा हाइकू संग्रह प्रकाशित.

संपादन : गीत पराग

सह संपादक : प्रतिनिधि लघुकथायें

संपर्कः 1050, सरस्वती निवास, शक्ति नगर, गुप्तेश्वर, जबलपुर-482001 (म.प्र.),

डॉ. गीता गीत

भिखारी दोस्त

रमाकांत विश्वविद्यालय के हॉस्टल में रहकर शोध कार्य कर रहे थे. विश्वविद्यालय के सामने ही चाय पान का टपरा था. प्रतिदिन सभी प्रोफेसर यहीं से चाय मंगवाकर पीते थे. रमाकांत जब चाय पीने जाते थे तो कभी-कभी एक लंगड़ा लूला भिखारी लहराता हुआ उनके पास आकर खड़ा हो जाता था. रमाकांत उसे भी कभी-कभी चाय पिलवा देते थे. रमाकांत के मित्र लोग उन्हें भिखारी का दोस्त कहकर चिढ़ाते थे. एक दिन रात को ग्यारह बजे एकाएक रमाकांत को घर की बहुत याद आने लगी. उनका मन बैचेन हो उठा उन्हें लगने लगा अभी के अभी घर जाया जाए. उन्होंने अपने कपड़े उठाये और बाहर निकलने को हुए तो उन्हें याद आया पैसे तो पास में बिल्कुल नहीं हैं. सोचा बाहर जाकर चाय पान वाले से उधार मांग लेंगे, परंतु बाहर दुकानें बंद हो चुकी थीं. अभी वह खड़े होकर कुछ सोच ही रहे थे कि लंगड़ा भिखारी लहराता हुआ उनके पास आया और बोला क्या बात है साहब? आप बहुत परेशान लग रहे हो. रमाकांत ने कहा घर जाने के लिए आखिरी बस बारह बजे की है और मुझे घर की बहुत याद आ रही है पर पास में पैसे नहीं हैं. लंगड़े भिखारी ने अपने जेब में हाथ डाला और बहुत सारी चिल्लर निकालकर रमाकांत जी के हाथ में रखा और कहा साहब आप घर जाओ. रमाकांत जी को शर्म आ रही थी वो बोले नहीं-नहीं रहने दो तुम मत दो पैसे परंतु भिखारी अड़ गया और बोला आप लौटकर मेरे पैसे दे देना. मन नहीं माना सो पैसे लेकर रमाकांत गांव चले गये. गांव जाकर पता चला छोटा भाई छत से गिर गया है उसे अस्पताल में भर्ती किया गया है. एक सप्ताह बाद भाई जब ठीक हुआ रमाकांत वापस लौटे और उस भिखारी को सौ रुपये का नोट पकड़ाया. भिखारी ने तीस रुपये उन्हें लौटाये. रमाकांत ने कहा भाई तुम पूरे पैसे रख लो. भिखारी बोला साहब भीख मांगते हैं परंतु इतना भी ज्ञान रहता है कि जेब में कितने पैसे हैं. मैंने आपको सत्तर रुपये दिये थे सो सत्तर ही वापस लूंगा. भिखारी हूँ पर बेईमान नहीं.

आम का पेड़

गांव के अपने घर के आंगन में रमाकांत ने बहुत ही प्यार और जतन से आम का एक पौधा लगाया था तब उन्होंने सोचा भी न था कि एक दिन यहां से दूर जाना पड़ेगा. हुआ भी वहीं. दो-तीन साल बाद ही रमाकांत के पिता जो पुलिस के अफसर थे, का तबादला बड़े शहर में हो गया. रमाकांत को जहां शहर आने की खुशी थी वहीं आम के पेड़ से जुदाई का गम भी था. देखते ही देखते शहर में रहते हुए रमाकांत भी पढ़-लिखकर अफसर बन गये और फिर एक दिन उनके उसी गांव में मुख्यमंत्री जी का कार्यक्रम था. रमाकांत जी को उस गांव में जाना पड़ा. घूमते-घामते वे अपने पुराने घर के सामने पहुंच गये. सबकुछ बदल चुका था परंतु पुलिस क्वार्टर अभी भी ज्यों का त्यों था और इत्तफाक से घर का दरवाजा भी खुला था. रमाकांत खुले दरवाजे से होते हुए आंगन में पहुंच गये. देखा आम का पेड़ विशाल रूप धर चुका था. बड़े-बड़े आम लटक रहे थे. उन्हें बहुत खुशी हो रही थी तभी दो-तीन आम टप-टप रमाकांत जी के सामने आकर गिरे. उन्होंने उन आमों को उठा लिया. तभी एक व्यक्ति का कठोर स्वर सुनाई दिया कौन हैं साहब आप और यहां क्या कर रहे हैं यह मेरा घर है आप अंदर कैसे घुसे. रमाकांत जी ने बड़ी नम्रता से बताया यह घर बचपन में मेरा हुआ करता था और इस आम के पेड़ को मैंने लगाया था. उस व्यक्ति ने कहा साहब मैं भी एक पुलिस वाला हूं और यहां रह रहा हूं मैंने कभी भी अपने आप इस पेड़ के आम को गिरते नहीं देखा है. आज पहली बार देख रहा हूं. आपके सामने अपने आप इतने सारे आम गिरे हैं. उस व्यक्ति ने फिर कुछ आम और दिए और कहा साहब इस पेड़ ने आपको पहचान लिया है. रमाकांत सोचने लगे- आज जब आदमी, आदमी को नहीं पहचानता तब इस आम के पेड़ ने मुझे पहचान लिया.

---------

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "लघुकथाएँ : डॉ. गीता गीत // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.