लघुकथाएँ : तारिक असलम ‘तस्नीम’ // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

clip_image002

तारिक असलम

जन्म : 3 अप्रैल, 1962

उपलब्धियां : लघुकथा संग्रह-4, कविता संग्रह-1, कहानी संग्रह-2, संपादन- कथासागर (त्रैमासिक)

संपर्कः प्लाट-6, हारून नगर कॉलोनी, फुलवारी शरीफ, पटना पश्चिम-801505 (बिहार)


तारिक असलम ‘तस्नीम’

चरित्र

सुबह का समय था. नाश्ते के बाद बस यों ही हम दोनों पोर्टिको में खड़े थे. एकाएक रहमान साहब के घर से बुर्के में ढंकी एक औरत निकली तो मैंने यों ही पत्नी से पूछ लिया- "रजिया, यह कौन है जो बुर्के पहनने के बावजूद कांधे से बैग लटाकये जा रही है?"

"अजी, आपने नहीं पहचाना. यह रहमान साहब की पोती है. कॉलेज जा रही है. मगर यह बुर्का सिर्फ कॉलोनी से बाहर निकलने तक के लिए पहनती है." उसने तल्ख लहजे में बताया.

"तुम्हारा मतलब? मैं समझा नहीं."

"अजी! एक दिन मैंने आंखों से देखा है कि वह मेन रोड पर पहुंचते ही नकाब उतार कर बैग में रख लेती है और जींस पैंट के ऊपर टी शर्ट पहन कर कॉलेज चली जाती है."

"अरे, यह तो कमाल की बात है."

"हां जी, यही तो चरित्र है. दोहरी जिंदगी जीती हैं सबकी सब. खुदा खैर करे."

सच्ची खबर

पड़ोस में रहने वाली दोनों सहेलियां कॉलेज जाने के लिए एक साथ घर से बाहर निकलीं. फिर तेज कदमों से एक ऑटो में जा बैठीं.

लम्बी-चौड़ी सड़कों से गुजरते हुए रेहाना ने सानिया के कानों में फुसफुसाते हुए कहा, "सानिया हम जहां जा रहे हैं, वहां तुम्हें भी साथ रहना होगा. बस! कुछ देर तक...तब तक तुम ड्राइंगरूम में बैठी रहना. मेरी बात समझ गयी न! मैं तुमसे क्या कह रही हूं?" रेहाना ने अपनी बात पर जोर देकर समझाया.

"अच्छा बाबा, जैसी तेरी मर्जी. जो तू कह रही है, मैं बिल्कुल वैसा ही करूंगी. ठीक न्!" सानिया ने उसे तसल्ली दी.

कुछ मिनटों के बाद दोनों सहेलियां एक शानदार बंगले के मुख्य द्वार पर खड़ी थीं. दरवाजा खुलते ही दोनों भीतरी कमरे में दाखिल हो गयीं. उनके सामने एक अच्छे कद काठी का आकर्षक युवक खड़ा था, जिसे देखकर सानिया ने यही अनुमान लगाया कि वह रेहाना का ब्वायफ्रेंड है.

"यह मेरी सहेली सानिया है. मेरे घर के बगल में रहती है. कॉलेज आना-जाना भी इसी के साथ होता है. तुम तो मेरी प्राब्लम समझते ही नहीं आमिर! न घर आते हो, न मम्मी-पापा से बात करते हो... बस जब चाहे यों ही बुला लेते हो. यह अच्छी बात नहीं है." रेहाना ने थोड़ी नाराजगी प्रकट की. आमिर ने मुस्कुराते हुए उसकी सारी बातें अनसुनी कर दीं और रेहाना को लेकर बेडरूम में घुस गया. सानिया सबकुछ देखती रही.

जब वह कमरे से बाहर आये, रेहाना से नजरें मिलीं. उसका चेहरा गुलाबी दिख रहा था और आमिर बेहद मीठी नजरों से सानिया को घूरे जा रहा था.

एक अर्से के बाद कुछ ऐसा हुआ कि आमिर ने सानिया से शादी कर ली और रेहाना ने यह खबर सुनने के बाद खुदकुशी.

घरवालों ने अपनी बदनामी के डर से पुलिस थाने में बयान दर्ज कराया कि बीएससी का रिजल्ट खराब होने के कारण उसने खुदकुशी कर ली और अगले दिन यही सच्ची खबर अखबारों में भी प्रकाशित हो गयी.

--

डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद

जन्म : 14.09.1926, जमशेदपुर (झारखंड), उपलब्धियां : अजनबी, झरोखा, विषकन्या, केशरवानी वैश्य समाज पुनर्मिलन (उपन्यास) जागर्स पार्क की कहानियां

संपर्कः 17-5, पांचवा फेज, आदर्शनगर, पो. सोनारी, जमशेदपुर-831011(झारखंड),

------------

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "लघुकथाएँ : तारिक असलम ‘तस्नीम’ // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.