बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथा : कीर्ति श्रीवास्तव // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

कीर्ति श्रीवास्तव

समसामयिकता

एक दिन मास्टर साहब ने जैसे ही परीक्षा की तिथि घोषित की, सभी जानवर परीक्षा की तैयारी में लग गये. पर चंपक को कोई मतलब नहीं था.

‘चंपक परीक्षा शुरू होने वाली है, पढ़ाई क्यों नहीं कर रहे.’ चंपक की मम्मी में चंपक से पूछा.

‘मां कल से पक्का पढ़ना शुरू कर दूंगा.’ चंपक ने थोड़ा अलसाते हुए कहा.

रोज यही होता. चंपक की मम्मी रोज पढ़ने को कहती और चंपक रोज कल पर टाल देता. एक दिन उसकी मम्मी ने तंग आकर सोचा- ‘अब तो चंपक को सबक सिखाना ही होगा.’

अगली सुबह रोज की तरह ही चंपक ने दूध मांगा.

‘आज दूध नहीं लाई बेटा.’ अपनी योजनानुसार मम्मी ने कहा.

‘मुझे दूध अभी पीना है.’ चंपक ने गुस्से में कहा.

‘कल पक्का ले आऊंगी.’ मम्मी ने हल्की मुस्कुराहट के साथ कहा.

‘मां, बहुत जोर के भूख लगी है. जल्दी से खाना नहीं बनाया. सब्जी कल ले आऊंगी.’

मम्मी ने भी अपनी योजना को आगे बढ़ाते हुए जवाब दिया.

चंपक उदास होकर दोस्तों के साथ खेलने चला गया.

खेलते-खेलते चंपक गिर गया है और वह रोते-रोते मम्मी के पास आया- ‘मां मुझे चोट लग गई है, दवा लगा दो.’ अपने आंसू पोंछते हुए चंपक बोला.

योजनानुसार कर्ता ने कहा- ‘दवा खत्म हो गई है, कल बाजार जाऊँगी तब लाकर लगा दूगी.’

चंपक झिल्ला उठा- ‘क्या आपने हर काम के लिए कल-कल लगा रखी है. आज का काम तो आज ही होगा न. भूख तो अभी लगी है, चोट भी अभी लगी है.’

‘क्यों तुम भी तो हर काम कल पर टाल देते हो.’ मम्मी तपाक से बोली.

चंपक को पूरा माजरा समझते देर नहीं लगी कि ये सब मम्मी उसे सबक सिखाने के लिए ही कर रही थीं.

----

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.