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लघुकथाएँ : डॉ. रामनिवास ‘मानव’ // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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डॉ. रामनिवास ‘मानव’

जन्म : 2 जुलाई 1954, तिगरा जिला महेन्द्रगढ़ (हरि.)

उपलब्धियां (विभिन्न विधाओं में) : काव्य कृतियां- चौदह, बाल काव्य संग्रह- चार, लघुकथा संग्रह- चाय, शोध प्रबंध- नौ, संपादित- दस

संपर्कः 571, सेक्टर-1, पार्ट-2, नारनौल-123001

डॉ. रामनिवास ‘मानव’

दौड़

मैं काफी देर से उसकी गतिविधियों को देख रहा हूं. वह हर आते-जाते वाहन को रुकने का संकेत करता है, लेकिन रुकना तो दूर, कोई उसकी ओर देखता तक नहीं. उसके हाव-भाव से स्पष्ट है कि वह देश के किसी दूर-दराज इलाके से आया कोई अनपढ़ ग्रामीण है, जो संभवतः पहली बार मुंबई जैसे महानगर में आया है और इसके तौर-तरीकों से बिल्कुल अपरिचित है.

मुझे लगता है, वह कोई व्यक्ति नहीं, देश का अति पिछड़ा गांव है, जो तेज रफ्तार से दौड़ते महानगर से जैसे कह रहा है- ‘प्रगति के इस दौर में, कुछ दूर तक, मुझे भी साथ ले चलो महानगर!’ लेकिन कुछ देर ठिठककर उसके संकटों को देखें, उसकी भावनाओं को समझें, इसकी फुर्सत कहां है महानगर के पास.

फिलहाल मेरा चिंतन उस ग्रामीण का संकट और महानगर की दौड़ जारी है.

फिल्म

फिल्म चल रही थी. जो व्यक्ति अभिनय कर रहा था, न भाव उसके थे, न स्वर और संगीत, यहां तक कि फिल्म की पटकथा और संवाद भी किसी और के लिखे हुए थे तथा उसे निर्देशित भी कोई और ही कर रहा था.

मुझे लगा, वह अभिनेता कोई और नहीं, मैं स्वयं हूं और मैं कोई फिल्म नहीं देख रहा, बल्कि अपनी ही कहानी सुन रहा हूं.

-तंदूरी चिकन

‘तुम इस लड़की को या ऐसी किसी भी लड़की को अपने निजी ‘गेस्टरूम’ अथवा फार्महाउस पर ले जा सकते थे, फिर तुम्हें इस बदनाम जगह पर आने की क्या आवश्यकता थी?’

एक मसाज पार्लर से लड़की के साथ पकड़े गये बिगड़ैल अमीरजादे से पुलिस-अधिकारी ने पूछा, तो उसका उत्तर था- ‘तंदूरी चिकन को होटल में खाने का जो मजा होता है, सर! वह उसे घर ले जाकर खाने में कहां!’

हत्या

चौराहे पर चर्चा चल रही थी. पूर्णिमा-हत्याकांड के सभी आरोपी बरी हो गये. लेकिन प्रश्न था कि जब पूर्व-आरोपियों ने उसे नहीं मारा, तो फिर मारा किसने?

इस गंभीर प्रश्न का सरल-सा उत्तर था एक सामान्य से आदमी के पास ‘कानून ने.’

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