लघुकथाएँ : श्रीराम ठाकुर ‘दादा’ // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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श्रीराम ठाकुर ‘दादा’

विचित्र कुर्सी दौड़

देश के एक महत्वपूर्ण पद के लिये कुर्सी दौड़ होनी थी. कुल चार उम्मीदवार थे. चारों प्रतिष्ठित और समाजसेवी. एक न्यायाधीश को निर्णायक के रूप में बैठाया गया. चार व्यक्तियों के लिए तीन कुर्सियां रखी गयीं. निर्णायक ने हाथ में घंटा लेकर कुर्सी अभिलाषियों को समझाया, जब तक मैं घंटा बजाता रहूं तब तक आप कुर्सियों के आसपास चक्कार लगाना, जैसे ही बजाना बंद कर दूं फौरन अपनी निकटतम कुर्सी पर बैठ जाना.

सब उम्मीदवारों ने सहमति देकर दौड़ना शुरू कर दिया. घंटा जैसे ही रुका, तीन आदमी बैठ गये. चौथे को निर्णायक ने प्रतियोगिता से बाहर कर दिया. फिर उन्होंने एक कुर्सी हटाकर दो मैदान में रहने दीं, फिर घंटा बजा, तीनों दौड़ते रहे, घंटा रुकते ही दो कुर्सियों पर बैठ गये. तीसरा निराश होकर बाहर निकल गया. अब मैदान में केवल एक कुर्सी थी और दो उम्मीदवार, दोनों उम्मीदवारों के घनिष्ट व्यक्ति पास आकर कुछ विशेष हिदायतें देने लगे, जब पराजय का अंतिम फैसला था, उम्मीदवारों की धड़कनें तेज हो गयीं. अंतरमन में प्रश्न उठ रहा था, देखें किसको यह महत्वपूर्ण पद प्राप्त होगा.

निर्णायक ने अंतिम दौड़ प्रारंभ करा दी. दोनों उम्मीदवार कनखियों से कुर्सी देखते जाते और दौड़ते जाते, निर्णायक घंटा बजाने में मस्त था. आसपास की भीड़ सांस रोके जीत-हार का फैसला देखने को आतुर थी. जब घंटा बजना बंद हुआ तो लोगों ने देखा, उस कुर्सी पर निर्णायक महोदय स्वयं जम गये हैं.

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