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लघुकथाएँ : आशा भाटी // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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आशा भाटी जन्म - 9 सितंबर 1954 (कटनी) उपलब्धियां - जाह्नवी, नई दुनिया, अक्षर-खबर, झंकृति, प्राची, प्रतिनिधि लघुकथाएँ ककुभ एवं हरीराम हँसा में...

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आशा भाटी

जन्म- 9 सितंबर 1954 (कटनी)

उपलब्धियां- जाह्नवी, नई दुनिया, अक्षर-खबर, झंकृति, प्राची, प्रतिनिधि लघुकथाएँ ककुभ एवं हरीराम हँसा में लघुकथाएँ प्रकाशित.

संपर्क- एम.आई. जी-8, विजयनगर

जबलपुर-482002 (म.प्र.),

आशा भाटी

अतिशयोक्ति

मैं अपनी एक सहेली के यहां अचानक पहुंची तो घर की अस्त-व्यस्त हालत को देखकर हक्की-बक्की रह गई. पूरा सामान जहां-तहां फैला पड़ा था. ऐसा लगता था जैसे असामाजिक तत्वों ने लूटपाट की और फिर पिछली गली से नौ दो ग्यारह हो गये हों.

"सरला ओ सरला-" मैंने दो तीन आवाजें देकर सरला को बुलाना चाहा.

जब कोई उत्त्र नहीं मिला तो परेशान हो गई. पड़ोसियों से हालात जानने के लिये जिज्ञासावश बाहर निकलने लगी तो अंतःपुर से आती सिसकियों की आवाजों ने अंदर तक झकझोर दिया.

"जरूर लुटेरे गृहस्वामिनी को लूटकर भाग निकले हैं." मैंने अपना विश्वास पक्का करते हुए सोचा. फिर रसोई घर की तरफ आवाजों का अनुसरण करती हुई चल दी.

"क्या हुआ? क्यों रो रही हो?" मैंने सरला को कंधे से पकड़कर धैर्य बंधाते हुए पूछा. सरला फफक कर रो पड़ी. उसके सब्र का बांध फिर फूट चला था. वह बमुश्किल अपने पति से झगड़े की बात बता पाई.

"माई गाड! मैं तो कुछ और समझी थी. घर का यह हाल तुम्हारे पति ने किया है. बाप रे! चलो उठो बिल्कुल नमूना लग रही हो...कहां गये तुम्हारे पति?"

"दफ्तर..."

"दफ्तर...और वह भी तुम्हें ऐसी हालत में छोड़कर! तुमसे पूछा भी नहीं कि तुम्हारे सिर में यह चोट कैसे लगी. कोई डॉक्टर...वॉक्टर..."

"कहां का डॉक्टर बहिन...एक-एक दिन बड़ी मुश्किल में जी रही हूं. रोजमर्रा की बातें हैं ये. कोई एक घाव हो तो दिखलाऊं..."

"क्या...?" जैसे मैं आसमान से उड़ते-उड़ते जमीन पर आ गिरी.

"रोज-रोज पीकर आते हैं. जुआ अलग खेलते हैं. रोकती हूं तो परिणाम सामने है. मुझे तो डर लगता है कि एक दिन मेरी बसी बसाई गृहस्थी जरूर चौपट होकर रहेगी.

"और कुछ बाकी रह गया हो तो ब्लाउज हटाकर मेरी पीठ देखो...देख लो, कदम से कदम मिलाकर चलने वाला आदम आज हव्वा से कैसे-कैसे बदले ले रहा है. देख लो इस पुरुष को, जो झूठे अहम, क्रोध और दुष्कर्मों के बीच जी रहा है.

"तुम लेखिका हो न. लिख दो मेरी यह कहानी. समझा दो पूरी नारी जाति को इस अत्याचार की कहानी. एक न एक दिन उनके साथ भी यही होना है. औरत का जन्म लेना इस पृथ्वी पर कितना कष्टकर हो गया है."

थोड़ा बोलने वाली सरला आज बम के माफिक फट पड़ रही थी. सचमुच नारी आज भी असहाय है. आज का पुरुष न तो बच्चों की उचित देखभाल करता है और न पत्नी की भावनाओं का समुचित आदर. स्त्री लतभंजन कर यह पुरुष पौरुषमय हो जाता है, उफ!

एक समय था जब घर-घर में स्त्रियों का आदर हुआ करता था. स्त्रियां भी अपनी गृहस्थी, पति और बच्चों के प्रति पूरी तरह समर्पित होती थीं. बहुत गंभीर और उदार होता था पुरुष, पत्नी को अर्धांगिनी समझनेवाला पति, पत्नी के सुख-दुख में बराबर का भागीदार होता था. न तो उसे तब दहेज की जरूरत होती थी, न उधार के ठाट बाट की. वह अपने बाहुबल पर विश्वास करता था. उसे अपनी कमाई पर पूरा-पूरा भरोसा हुआ करता था. पर आज...

आज ऐसा नहीं है. पाश्चात्य सभ्यता में डूबी यह नई पीढ़ी पूरी तरह गुमराह है. उसे खुद अपना भार वहन करना नहीं आता. पत्नी को लेकर क्या खाक चलेगा वह. ऊपर से दर्जनों व्यसन.

चमक-दमक में कुछ साल बिताकर हमेशा का दुख-दर्द गले में बांधनेवाला पुरुष बाद में पत्नी का दुश्मन हो जाता है. उस पत्नी की दुर्दशा तब सरला बहिन जैसी हो तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिये...

(जाह्नवी से साभार)

अनुसंधान

एक स्कूलिया बच्ची स्कूल से घर लौटी. उसने अपने घर के सामने के बिजली के तारों में एक चिड़िया फंसी देखी. चिड़िया ज्यों-ज्यों निकलने का प्रयास करती, त्यों-त्यों और उलझती जाती. उसको उलझा-फंसा देखकर कौओं के दल ने उसे घेरना शुरू कर दिया.

‘अरे, ये कौए तो उसे खा जाएंगे.’ उसने अपने आपसे प्रश्न किया. उसे उसके दिमाग ने जो उत्तर दिया, उसी हिसाब से वह उड़ते कौओं पर पत्थर फेंकने लगी. कौए तो कौए...चारों तरफ़ से घेरने लगे. लड़की पत्थर फेंकते-फेंकते बुरी तरह थक गयी. उसे एक तरकीब सूझी और उसने आनन-फानन एक गुलेल बना डाली.

लड़की गुलेल से तक-तक कर कौओं पर पत्थर बरसाने लगी. आखिर कौओं को अपना शिकार छोड़ना पड़ा. कौओं के भागने पर ही उसने पत्थर बरसाना बंद किया.

यह तय है कि आपदा ही किसी अनुसंधान को जन्म देती है और इसमें कोई छोटी-बड़ी उम्र की भूमिका भी तय नहीं होती है.

आखेटक

शम के धुंधलके में दो हम उम्र किशोर-किशोरी धीरे-धीरे बतिया रहे थे. लड़की कह रही थी- ‘देखो जी, आप मुझे अपने घर ले चलो. मैं अब कहीं की नहीं रह गई हूं?’ लड़का बोला- ‘यह कतई संभव नहीं है यार, मेरी मां इसकी कभी कोई अनुमति नहीं देगी.’

‘पर मेरा तो पर्दाफाश हो जाएगा. कल डॉ. शोभा आंखों ही आंखों में ‘खुशखबरी है’. जैसी मूक भाषा व्यक्त कर रही थीं.’

लड़का बोला- ‘उसी डॉ. के पास फिर चली जाओ. रोक लो अपने आप को पर्दाफाश कराने से...ज़माने में एक्सपोज होने से बचने की जिम्मेवारी अब तुम्हारी है.’

लड़की बोली, ‘देखो जी, उस समय तो तुम मुझे हर संभव अपनाने की बात कह रहे थे. लिव इन रिलेशनशिप की भी बातें की थी...और अब तुम्हें अपनी मां का स्टेट्स याद आ रहा है...मेरा...मेरा क्या स्टेट्स बनेगा इसका कुछ ख्याल भी है’.

लड़की रोने लग गई थी. वह लड़का उस लड़की को भविष्य के आगोश में बिलखता छोड़कर चला गया.

दरअसल वह आखेटक था, आखेट कर चला गया था. लड़कियों को चाहिए कि ऐसे आखेटक से स्वयं को बचाएं, वरना एक्पोज होने के लिए तैयार रहें.

आँखों पर पट्टी

वे दो भाई थे.

एक बड़ा भाई, एक छोटा भाई.

कहते हैं कि पिता ने बड़े भाई को अपने जीते जी सारे अधिकार दे दिये थे. बहुत दिन हुये जब पिता नहीं रहे, छोटा भी समझदार हुआ. उसने बड़े भाई से अपना अधिकार मांगा, पर भाई के एकाधिकार के चलते उसे शरण देने वाला कोई नहीं मिला. छोटे ने अपनी मां की शरण ली- "मां तुम्हारे जीते जी, जो मुझे कुछ नहीं मिला तो फिर क्या मिलेगा."

मां कुछ नहीं बोली.

पुत्र ने कहा- "तू कैसी मां है. जीभ पर ताला डाल रही है, जब तू ही नहीं बोलेगी तो दूसरा कौन बोलेगा."

"बेटे, पिता के निर्णय को पलटने की हिम्मत अभी तक किसी मां को नहीं मिली है जब तक धृतराष्ट्र जैसे पिता जीवित रहेंगे, गांधारियां अपनी आंखों में पट्टी बांधने के लिए विवश रहेंगी."

कहती हुई मां अपने शयन कक्ष में विश्राम करने चली गई. बेचारा छोटा भी अपनी रोनी सूरत लिये वहां से चला गया. कहते हैं दोनों भाइयों के बीच करोड़ों की संपत्ति थी जिसका बंटवारा होना था.

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रचनाकार: लघुकथाएँ : आशा भाटी // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक
लघुकथाएँ : आशा भाटी // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक
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