गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : आनंद कुमार तिवारी // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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आनंद कुमार तिवारी

जन्म : 22 नवंबर 1947

प्रकाशन : कहानी संग्रह- मेरा कसूर क्या है, लघुकथा संग्रह (प्रकाशनाधीन)

सम्मान : साहित्यिक संस्था कादम्बरी द्वारा स्व. नर्मदा प्रसाद खरे सम्मान कहानी संग्रह के लिए.

संपर्कः तुलसीधाम, 36, चंचल कॉलोनी, लक्ष्मीनगर के पास पिपलानी, भोपाल (म.प्र.),

आनंद कुमार तिवारी

अनुत्तरित प्रश्न

उनकी बर्तन साफ करने वाली बाई, अपने दो बच्चों को साथ में लेकर काम पर आती थी. उन्हें बच्चों से परेशानी तो थी, किंतु अच्छी बाइयां नहीं मिलती हैं, इसलिए बच्चों को सहन करना उनकी विवशता थी. बच्चे शैतानी न करें और शांत रहें, इसलिये वे टी.वी. चालू कर कार्टून चैनल लगा देतीं. दोनों बच्चें कार्टून देखने में उलझे रहते और वे स्वयं बाई के आसपास मंडराती हुई उसे देश-विदेश के समाचार सुनाती हुई उसके काम की निगरानी करती रहतीं.

वे हमेशा बाई से बच्चों को पढ़ने के लिये स्कूल भेजने को कहतीं और बाई हंस कर टाल देती. एक दिन बिजली नहीं होने के कारण टी.वी. चालू नहीं हुआ, इसलिए बच्चे शैतानी करने लगे. कुछ देर तक उन्होंने बर्दाश्त किया. परन्तु बच्चे शैतानी करते ही जा रहे थे.

अतः वे नाराज होकर बाई से बोलीं- ‘तुम अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजकर उनका भविष्य बिगाड़ रही हो. वे दिन पर दिन शैतान होते जा रहे हैं. बड़े होकर तो उनका आचरण और खराब हो जायेगा.’

उनकी सीख सुनकर बाई बोली- ‘क्यों भेजूं मैं बच्चों को स्कूल...? आप ही तो बताती रहती हो कि एक स्कूल में टीचर ने एक बच्चे को चालीस चांटे मारे. एक बच्ची यूनीफार्म पहनकर नहीं आई तो उसे लड़कों के टायलेट में खड़ा कर दिया. एक स्कूल में छोटी बच्ची के साथ बलात्कार हुआ. कुछ देर पहले आप बता रही थीं कि एक स्कूल में एक टीचर ने एक बच्चे को दस चांटे मारे और आठ बार स्केल से पीटा. फिर भी मन नहीं भरा तो चार बार लातें भी मारीं. अब आप ही बताओ कि जब स्कूल भेजने से बच्चों का जीवन सुरक्षित नहीं है तो उन्हें पढ़ाने-लिखाने से क्या फायदा? इससे अच्छा तो उनका बिना पढ़े-लिखे होना ही ठीक है.’

बाई की बातें सुनकर उन्हें कोई उत्तर नहीं सूझा.

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