लघुकथाएँ : महेन्द्रसिंह महलान // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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महेन्द्रसिंह महलान

दीया-बाती और तेल

दीये और बाती में नासमझ पति व पत्नी की भांति तकरार बढ़ गई थी. उनका अहम् सूखे बांसों की तरह आपस में टकराने लगा था. दीया घमण्ड में भरकर बोला, ‘मेरे बिना तुम्हारा अस्तित्व ही कहां है? मैं तुम्हारा आधार हूं. मैं तुम्हें आश्रय न दूं तो तुम जमीन में लोटती फिरो!’

बाती ने ऐंठकर कहा, ‘मैं हूं तो तुम्हारी शोभा है. नहीं तो तुम्हें कौन पूछे? मेरी रोशनी से ही तुम्हारा उजाला है.’

दोनों के झगड़े की आग में नेह का तेल जलकर सूख गया. तेल के खत्म होते ही बाती फक्-से बुझ गई और दीया भी तो तत्क्षण अंधेरे में डूब गया.

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