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लघुकथाएँ : बलराम अग्रवाल // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

 अपने-अपने सुकून

"बच्चे की मौत का मुझे गहरा अफसोस है, लेकिन मन को एक सुकून भी है रामलाल."

"मौत पर सुकून? क्या कह रहे हैं अलीम सर!"

"ठीक कह रहा हूँ. सुकून की बात है कि बच्चा हमारे मजहब का नहीं था. होता तो ‘सेक्युलर’ लोग आसमान सिर पर उठा लेते...कितनी ही कविताएँ और कहानियाँ लिख डालते. फेसबुक और ट्विटर पर पता नहीं कितने जनाजे निकाल डालते."

"आपने मेरे मन की बात छीन ली सर! मैं भी बहुत सुकून महसूस कर रहा हूँ।"

"करना ही चाहिए."

"फर्क है सर! मैं इसलिए सुकून में हूँ कि पकड़ा गया अपराधी हमारे धर्म का निकला. आपके मजहब का निकलता तो ‘राष्ट्रवादी’ आसमान सिर पर उठा लेते...हत्या कर डालते आपसी मेल-मिलाप की."

गाँव अभी भी

उस चिलचिलाती धूप में स्टेशन से बाहर आते ही रमन की निगाहें रिक्शा तलाशने लगीं.

"आजाद नगर कॉलोनी चलोगे?" जैसे ही रिक्शा नजर आई, उसने चालक से पूछा.

"आजाद नगर कॉलोनी में... किधर?" चालक ने पूछा.

"ए अट्ठानवें." नजदीक पहुंचकर उसने बताया.

"ए अट्ठानवें..." मस्तिष्क में ए अट्ठानवें की लोकेशन देखता-सा वह आँखों को चढ़ाकर बुदबुलाया, फिर बोला, "पचास रुपए लगेंगे."

"चलो." यह सुनते ही रमन रिक्शा की सीट पर बैठ गया.

वह पैडल मारता हुआ चल दिया. कुछ दूर चलने के बाद बोला, "आपने देखा है न ए अट्ठानवें?"

"क्यों?"

"हम नए-नए आए हैं...भटक जाएँ तो बता दीजिएगा." उसने कहा, "कहाँ के हो?"

"पूरब के."

"पूरब में किस शहर के हो?"

"शहर के नहीं, गाँव के हैं."

"यहाँ कैसे आए?" उसके घुमावदार जवाबों को सुन रमन ने विषय को बदलते हुए पूछा.

"कई साल से यहाँ चाचा लोग चलाते हैं रिक्शा." उसने कहा, "बेरोजगार थे, सो पिछले दिनों हम भी चले आए."

"ऐसा करना," रमन उससे बोला, "जहाँ जरा गफलत महसूस करो, वहीं उतार देना. अपनी रंगों में भी गाँव जिन्दा हैं अभी. आगे मैं खुद ढूँढ़ लूँगा."

"कहीं भी कैसे छोड़ देंगे साब." दायें और बायें पैडल पर बारी-बारी खड़ा हो रिक्शा को आगे बढ़ाता हुआ वह बोल उठा, "हम तो पूरे के पूरे गाँव ही हैं भीतर से बाहर तक. ए अट्ठानवें पर पहुँचाकर ही पैसा पकड़ेंगे आप से."

जिंदगी

पगड़ी की रस्म के बाद सारे मेहमान और रिश्तेदार विदा हो चुके थे.

उसी शाम, दीवार पर अम्मा की तस्व्ीर के साथ बाली जगह पर जगमोहन कीलें ठोंक रहा था. पिताजी की फ्रेम जुड़ी तस्वीर वहाँ टाँगनी थी.

6 और 8 वर्षीया रिंकी-पिंकी कौतूहल की मुद्रा में कभी अपने दादा जी की तो कभी मुद्दत से दीवार पर लटकी दादी जी की तस्वीर को देखती खड़ी थीं. पास ही खड़ी स्वर्णलता भरे मन से अपने ससुर को याद कर रही थी :

मंदिर से लौटकर, वे इधर से ही गुजरते और अम्मा जी की तस्वीर पर जरूर नजर डालते थे. साफ-सुथरा नजर आने के बावजूद, जेब से रूमाल निकालकर फ्रेम और शीशे को साफ करने लगते थे. कभी-कभी पुकार भी उठते थे गुस्से में, "जगमोह.....ऽ...न!" पुकार सुनते ही, सब काम छोड़कर वह दौड़ी चली जाती थी.

"जगमोहन किधर है?" वे निगाहें टेड़ी करके पूछते.

"वो तो ऑफिस जा चुके पिताजी!" वह सहमी-सी आवाज में अक्सर झूठ बोलती.

"कितनी बार कहा है कि माला पहनाने के समय शीशे और फ्रेम को एक बार देख लिया करो ढंग से," वे चिल्लाते, "श्रद्धा नहीं तो मना कर दे, मैं पहना दिया करूँगा माला. तुम लोगों को पता नहीं क्यों नजर नहीं आता!"

"क्या पिताजी?" वह पूछती.

"धूल और तिरछापन, और क्या!" शीशे को रूमाल से पोंछते हुए वे कहते, फिर फ्रेम को सीधा करने की कवायद में लग जाते. दोनों किनारों से उसे ऊपर-नीचे खिसकाने के थोड़ी देर बाद पूछते, "देखो जरा, अब ठीक है?"

गरदन को इधर-उधर हिलाकर वह कहती, "हाँ पिताजी, अब ठीक है."

"देखना सोना," इसी दौरान, पिताजी की तस्वीर को माताजी की तस्वीर के बराबर में सेट कर देने के बाद जगमोहन ने उससे पूछा, "सीधी टँगी है न?"

"टँगी तो सीधी ही है, पर..." हर कोण से तस्वीर के सीधेपन को परखते हुए स्वर्णलता ने भावुक स्वर में कहना शुरू किया तो जगमोहन ने पूछा, "पर, क्या?"

"कल से पिताजी नहीं होंगे यह पूछने और डाँटने-फटकारने के लिए." वह भरे गले से बोली.

पत्नी की बात सुन जगमोहन की भावुकता भी गले और आँखों से छलक-छलक पड़ने को हो आई. एक नजर उसने बच्चियों पर डाली, फिर अपने आप पर काबू पा, यथासम्भव मुस्कराते हुए बोला, "हाँ, लेकिन मैं और तुम हैं न! पिताजी वाला सवाल करके कभी तुम मुझे डाँटा करना, कभी मैं तुम्हें..."

सम्पर्क : एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-32

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