बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथा : हिंदी : सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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जन्म- 9 नवंबर 1951

जन्मस्थान- जगाधरी (यमुना नगर- हरियाणा)

उपलब्धियां- लघुकथा संग्रह, कविता संग्रह, कहानी संग्रह एवं बाल कथा संग्रह प्रकाशित

संपादन- मृग मारीचिका अनियतकालीन

सुरेंद्र कुमार अरोड़ा

हिंदी

शाम होती तो जी बहलाने के लिए परकाश बाबू घर से थोड़ी दूर बने पार्क में जा बैठते हैं. नौकरी के दिनों की बात और थी जब नाश्ता भी भागते-दौड़ते हुआ करता था. रिटायरमेंट के बाद सारा दिन घर की चार दीवारी में घिसी-पिटी यही आलसी दिनचर्या बनी रही तो शरीर जल्द ही जंग खा जायेगा. इसलिए वे ही क्यों उन जैसे और भी बहुत सारे लोग हर शाम, पार्क में वहीं आ बैठते हैं. एक-दूसरे से बात करके लगने लगता है कि शरीर की सक्रियता अभी समाप्त नहीं हुई है.

एक दिन इधर-उधर की बातों के सिलसिले में एक सज्जन बोले, "यदि आप समय निकाल पाएं तो हर रविवार सुबह के समय एक-दो घंटे के लिए डिस्पेंसरी में आ जाया कीजिए. चेरिटेबल किस्म की डिस्पेंसरी है. डॉक्टर साहब भी फ्री जैसी सर्विस देते हैं."

"पर मुझे तो मेडिकल फील्ड का कोई काम आता नहीं है, मैं वहां आकर क्या करूंगा? परकाश बाबू के स्वर में शंका थी.

"अरे नहीं, आपको दवा वगैरह थोड़े ही लिखनी या बांटनी है. आप तो बस मरीजों के नाम का पर्चा बनाकर उसकी एंट्री रजिस्टर में कर दिया कीजिएगा." उन्होंने आग्रह किया.

परकाश बाबू ने सोचा, ‘ठीक है इस बहाने फ्री में ही सही, मन लगाने का कोई जरिया तो मिला.’ "ठीक है आ जाया करूंगा."

तय समय पर परकाश बाबू डिस्पेंसरी पर पहुंच गए. वह रजिस्टर जिसमें उन्हें आने वाले मरीजों की एंट्री करनी थी पकड़ा दिया गया. वे अपनी कुर्सी और टेबल पर विराजमान भी हो गए. एकबारगी उन्हें लगा कि यह वही कुर्सी और वही मेज है जिस पर बरसों वे अपने ऑफिस में बड़े बाबू के रूप में बैठा करते थे और वहां आने वाला हर आदमी उनकी ओर बड़ी हसरत की निगाह से देखा करता था कि उनकी नजरे-इनायत हो जायें तो उसका काम बन जाये.

उन्होंने रजिस्टर खोला ही था कि पहला पेशेंट उनके सामने आया. वह एक महिला थी.

"बिटिया नाम बताओ." परकाश बाबू ने कहा.

"जी, गीतिका रानी."

उन्होंने रजिस्टर में क्रम संख्या ‘1’ पर लिखा, "गीतिका रानी."

"तुम्हारी उमर?"

"जी, 32 साल."

परकाश बाबू ने गीतिका रानी के नाम के आगे लिख दिया 32 और गीतिका का पर्चा बनाने के बाद उसे पर्चा थमाकर डॉक्टर साहब के पास भेजने के बाद अगले पेशेंट का पर्चा बनाने में मशगूल हो गए.

"तुम्हारा नाम?"

"रुकिए परकाश बाबू, यह क्या किया आपने?" डॉक्टर साहब अंदर से लगभग चिल्लाते हुए बोले.

"जी, कोई भूल हुई क्या?"

"जरा अंदर आईये." डॉक्टर साहब ने तल्ख आवाज में कहा तो परकाश बाबू फटाफट अपनी कुर्सी से उठकर डॉक्टर साहब के चैंबर में आ गए.

"लगता है आप डिस्पेंसरी बंद करवाएंगे." डॉक्टर साहब के माथे पर बल पड़े हुए थे.

"जी, मैं समझा नहीं."

"अरे आप हिंदी में पर्चा बनाएंगे तो लोग यहां आना बंद कर देंगे. हमारे पेशे में लोगों को हिंदी पर विश्वास नहीं है. हिंदी में लिखा नुस्खा देखते ही वे सोचते हैं कि जिस डॉक्टर को अंग्रेजी नहीं आती उसे इलाज करना क्या आता होगा. प्लीज पर्चे सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी में ही बनाइये. नहीं बना सकते तो अपनी जगह इस काम के लिए किसी और को लगवा दीजिए."

"नहीं-नहीं डॉक्टर साहब. सारी उमर हम अपने ऑफिस में अंग्रेजी में ही ड्राफ्टिंग करते रहे हैं. यहां तो सिर्फ नाम ही लिखना है." परकाश बाबू ने आंखों पर अपना चश्मा ठीक करते हुए सफाई दी "आप गीतिका रानी का पर्चा दीजिए, दूसरा बना देता हूँ."

डॉक्टर साहब ने पर्चा वापस कर दिया और परकाश बाबू ने बिना देरी किये वह पर्चा फाड़ दिया.

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