बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : प्रतापसिंह सोढ़ी // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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प्रतापसिंह सोढ़ी

उपलब्धियां : लघुकथा संग्रह- 4, लघुकथा संकलन- 25 में लघुकथाएं, कहानी संग्रह- 2, गजल संग्रह- 1

अनुवादः विविध भाषाओं में लघुकथाएं अनुवादित/प्रकाशित, पंजाबी कहानियों का हिंदी में अनुवाद

संपर्कः 5, सुख शांति नगर, बिचोली हाप्सी रोड,

इन्दौर- 452016,

प्रतापसिंह सोढ़ी

शर्मसार

यात्रियों से भरी बस में सीट न मिल पाने के कारण एक वृद्धा बस के हैंगर को पकड़े बड़ी देर से खड़ी थी. कई बार बस के झटकों से उसके हाथ से हैंगर छूट जाता था और वह बस के यात्रियों पर गिर पड़ती थी. बैठने के लिये थोड़ी सी जगह के लिये कई यात्रियों से उसने अनुरोध भी किया. लेकिन किसी ने भी उस पर दया नहीं की. विकलांग सीट पर बैठा एक विकलांग बड़ी देर से उस वृद्धा की दुर्दशा देख परेशान हो रहा था. उसने बस के परिचालक को इशारे से अपने पास बुलाया और बोला ‘वो जो वृद्धा बड़ी देर से गिरती-पड़ती बस के झटकों को सहन करते हुए खड़ी है, उसे मेरी सीट पर बैठा दो.’

परिचालक ने विकलांग की सीट के नीचे पड़ी बैसाखियों को देखकर कहा, ‘तुम्हारी तो दोनों टांगे ही नहीं है. ऐसी स्थिति में तुम बस में कैसे खड़े रह पाओगे.’

विकलांग ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘इस की चिंता मत करो. मैं अपने हौंसलों के बल पर खड़ा रहूंगा.’ बस यात्री दोनों की बातें सुन रहे थे. परिचालक के मन मस्तिष्क में विकलांग के शब्द ‘मैं हौंसलों के बल पर खड़ा रहूंगा’ गूंह रहे थे. इन शब्दों से प्रेरणा ले वह वृद्धा के पास जाकर विनयपूर्वक बोला ‘मांजी आप मेरी सीट (परिचालक) पर जाकर बैठ जाओ.’

परिचालक के इस वाक्य को सुनकर बस के यात्री शर्मसार हो गये.

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