लघुकथाएँ : ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

अपने हिस्से का प्रकाश

विद्यालय में मासिक जाँच परीक्षा चल रही थी. राजन ने एक छात्र की उत्तरपुस्तिका देख कर उस से कहा, ‘तू उस छात्र के पास बैठ जा. उस के देख कर लिख लेना.’

महेश से रहा नहीं गया. वह अपने हमउम्र प्रधानाचार्य राजन के पास जाकर धीरे से बोला , ‘सर जी! यह तो गलत है? उस छात्र को मन से लिखने देते? वह कुछ तो सीखेगा. मगर, आप तो उसे नकल करना सिखा रहे हैं.’

‘इस सीखने सिखाने के चक्कर में हमारा परीक्षा परिणाम कमजोर रह जाएगा. हम सब की वेतनवृद्धि रुक जाएगी. फिर वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश हैं. परिणाम अच्छा रहना चाहिए. चाहे कुछ भी करो.’

‘हम शिक्षक हैं सर जी. छात्रों के प्रति हमारा कुछ उत्तरदायित्व है. हमें उन्हें कुछ सिखाना चाहिए.’ महेश ने अपने मन की बात कही.

‘वही तो सिखा रहे हैं. जो स्वयं मेहनत करेगा, आगे बढ़ जाएगा, अन्यथा अमरबेल की तरह दूसरे वृक्ष पर लिपट कर फायदा उठ लेगा.’ कहते हुए राजन हंसा और अंतिम बात कही, ‘तुम उस की चिंता मत करो. उस का दिमाग नहीं चलता है. फिर भी वह पास होगा और आरक्षण की सीढ़ी चढ़ कर कहीं न कहीं पहुँच ही जाएगा.’

यह सुन कर महेश कुछ सोचते हुए खामोश हो गया. उस ने आज के अखबार में छपे चित्र को निहारा. जिसमें हथेली पर बैठा जुगनू उस छोटे से भाग को प्रकशित करने की कोशिश कर रहा था.

उसे देख कर महेश ने मन में दृढ़ निश्चय कर लिया, ‘वह बड़ी मछलियों के समक्ष खामोश नहीं रहेगा और न ही उन की नकल करेगा. वह इस जुगनू की तरह अपने हिस्से का प्रकाश जरुर फैलाएगा.’

संपर्क : पोस्ट ऑफिस के पास,

रतनगढ़-(नीमच) (म.प्र.)

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