बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : सीमा जैन // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

सीमा जैन

काशी की लकीरें

जब से नशामुक्ति अभियान से जुड़ी, तब से ही काशीबाई को जानती हूं. तीन बच्चे और शराबी पति, जो हर रोज अपनी तो अपनी, काशीबाई की मजदूरी के पैसे भी ज़हर में डुबो देता था.

काशीबाई कभी केवल रोटी, कभी नमक-चावल खाकर तो कभी भूखी रहकर अपने दिन काट रही थी.

आज काशीबाई मुझे अपनी झोंपड़ी में ले जाने की जिद करती बोली, ‘दीदी, चलो ना! आज बहुत दिन बाद रोटी के साथ भाजी बनाई है.’

जमीन पर बैठी मैं काशी को देख रही थी. उसके चेहरे की खुशी ने मुझे सुकून दिया.

चूल्हे के ऊपर कोयले से खिंची लकीरों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया. मैंने पूछा, ‘ये लकीरें कैसी हैं, काशी?’

वह बोली, ‘दीदी, हम अनपढ़ अपने पैसों का हिसाब कैसे रखें? ये लकीरें उसी के लिए हैं. पैसे मिलते तो एक लकीर बना देती और मर्द ने कमाई ले ली तो लकीर काट देती.’

मैंने लकीरों को ध्यान से देखा और कहा, ‘काशी, तो ज्यादा लकीरें कटी हुई हैं.’

काशी ने चहकते हुए कहा, ‘ऊपर नहीं, नीचे देखो दीदी, यहां लकीरें नहीं कटीं. तुम्हारी बातें सुनकर तो मेरे मर्द को समझ आई. चार दिन पहले ये लकीरें देखीं तो रो पड़ा. कहने लगा तू बच्चों के साथ कितना भूखा रही. इतनी सारी कमाई मैं पी गया... अब हम मिलके रोटी खाएंगे... बच्चों को भरपेट खिलाएंगे.

अपने आंचल से आंसू पोंछती काशीबाई बोली, ‘ये भाजी वो ही लाया है दीदी.’

संपर्क : 201 संगम अपार्टमेंट 82, माधव नगर (विजयनगर), ग्वालियर-474009 (म.प्र.)

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