गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : शंकर पुणताम्बेकर // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

शंकर पुणताम्बेकर

चुनाव

बच्चे से नतीजा सुनते ही स्कूल इंस्पेक्टर जीप से स्कूल की ओर दौड़ा और हेडमास्टर के कमरे में पहुंचते ही दहाड़ा, ‘ए मास्टर के बच्चे, भूल गया कि मेरा बच्चा तेरे स्कूल में पढ़ता है?’

हेडमास्टर ने फाइल से सिर उठाया और सहमे से एकदम खड़े होकर देखते रहे.

‘अरे तूने मेरे बच्चे को छोड़ उस पुलिस इंस्पेक्टर के बच्चे को पहला नंबर कैसे दे दिया?’

‘आप बैठिए तो श्रीमान.’

‘अरे श्रीमान के बच्चे, क्या तू भूल गया कि मैंने तुझे अपने बच्चे की पहले ही याद करा दी थी?’

‘भूला तो नहीं श्रीमान.’ हेडमास्टर ने बिलकुल शांत स्वर में कहा, ‘पर आपकी तरह पुलिस इंस्पेक्टर ने भी याद दिला दी थी. ऐसी हालत में मेरे सामने बड़ा सवाल खड़ा हुआ. जैसे नतीजा बच्चों का नहीं खुद का तैयार करना हो.’

‘अपना ही नतीजा! क्या बकते हो?’

‘बक नहीं रहा श्रीमान!... मुझे अपना नतीजा तैयार करना था कि रोटी और प्राणों के बीच किसे चुनूँ,....और आखिर मैंने प्राणों को चुना.’

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