लघुकथाएँ : राजकुमार घोटड़ // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

clip_image002

जन्मस्थान- गांव- भैंसली, तहसील-राजगढ़, जिला- चूरू (राज.)

प्रकाशित पुस्तकें- लघुकथा संग्रह-10, एक वृहद सूची लघुकथा संकलनों की (2006-2016), कहानी संग्रह- तीन, व्यंग्य संकलन- तीन, बाल साहित्य- तीन

सम्पर्क सूत्र- सादुलपुर (राजगढ़) जिला- चूरू, राजस्थान- 331023, फोन. 01559-224100 (निवास)

राजकुमार घोटड़

आतंकवादी

दो श्रद्धालु बहुत दिनों बाद तीर्थयात्रा से अपने शहर लौट रहे थे, गाड़ी स्टेशन पर पहुंची तब रात हो चुकी थी और उन्हें जानकारी नहीं थी शहर में साम्प्रादायिक दंगे फैले हुए हैं. वे ज्यों ही स्टेशन से बाहर आये तो वहां का सुनसान माहौल देखकर वे भयभीत से हो गये फिर भी वे दोनों पैदल ही सड़क से अपने घर की ओर चल पड़े. कुछ ही दूर चले होंगे कि पासवाली गली से सुलेमानी वेशभूषा में एक नकोबपोश उनके सामने आकर खड़ा हो गया और उनकी तरफ बंदूक तानते हुए गरजकर बोला-

"कौन हो तुम, किस जात-धर्म से हो....?"

"मुसलमान....." एक श्रद्धालु के मुहं से स्वतः ही निकल गया.

"तो, कुरान की आयतें सुनाओ...जल्दी सुनाओ नहीं तो गोली मार दूंगा..."

उन दोनों श्रद्धालुओं में से एक ने लड़खड़ाती आवाज व अस्पष्ट शब्दों में कुछ बोलना शुरू किया...

"ठीक है...ठीक है, भागो यहां से, पीछे मुड़कर मत देखना... नहीं तो..." और वो बंदूकधारी दूसरी गली में लुप्त हो गया.

"वाह भई, तुमने कमाल कर दिया...!" दूसरे श्रृद्धालु ने कहा. "उसने कहा तो था कुरान की आयतें सुनाने की और तुम बोलने लगे हनुमान चालीसा...! लगता है उसे कुरान की जानकारी नहीं..."

"तुम ठीक कहते हो, उसे कुरान की जानकारी नहीं," उस श्रद्धालु ने कहा- "अगर उसे कुरान की जानकारी होती तो वो आतंकवादी नहीं बनता."

मां का तकाजा

‘सुबह-सुबह क्या रह रहे हो?’ पत्नी ने पूछा

‘हिसाब.’

‘किसका?’

‘पिछले महीने मां आई थीं तब उनके पित की थैली का ऑपरेशन करवाया था.’

‘फिर, इससे क्या होगा...?’

‘आज दोपहर बड़े भैया जमीन बंटवारे के कागज लेकर आने वाले हैं, उनके सामने रखूंगा आखिर, उनकी भी मां लगती है...।’

एक और बिन्दु

पाण्डाल ब्राह्मण समुदाय से भरा हुआ था. ब्राह्मण महासभा में, समाज में बदलती जीवन शैली, पण्डिताई में सेंधमारी, आमजन का देवी-देवताओं व धर्म के प्रति बदलती आस्था, और आधुनिक युग में गिरते नैतिक मूल्य जैसे विषयों पर मंथन हो रहा था.

सभा में उपस्थित एक सदस्य ने खड़े होकर कहा कि हमारे समाज के लोगों की जीवन शैली शास्त्र संगत नहीं है. कुछ तो व्यवहार व आचरण में ढेड़-चमारों से भी गये बीते हो गये हैं जो एक अशोभनीय एवं चिंता का विषय हैं.

वो महोदय अपनी बात पूरी कर ही पाया था कि सभा के बीच से एक सिरफिरे ने उठकर कहा- "मास्टर जी, आपने हमें ढेड़-चमार की उपमा दी है. हमने यह संयम रखते हुए सहन कर लिया है लेकिन आप किसी पढ़े-लिखे ढेड़-चमार को विद्वान पंडित कह दोगे तो हमारे से बर्दाश्त नहीं होगा. हाँ... इस बात का ध्यान रखना."

महासभा के मंथन विषयों में एक और बिन्दु जोड़ लिया गया.

---------

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "लघुकथाएँ : राजकुमार घोटड़ // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.