लघुकथाएँ : राजेन्द्र परदेसी // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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राजेन्द्र परदेसी

जन्म : बबुरा, जिला- भोजपुर (बिहार)

उपलब्धियां : अनेक विधाओं की 12 कृतियां प्रकाशित हैं.

संपादन : प्रतिनिधि कहानियां (कहानी संग्रह)

संपर्कः 44, शिव विहार, फरीदीनगर, लखनऊ-226015


राजेन्द्र परदेसी

विवशता

वह खाना खाकर सोने के लिए लेट तो गया, लेकिन नींद आ नहीं रही थी उसे. उसकी आंखें बांस की मुड़ेर देख रही थीं और मन, वह तो पता नहीं कहां था. तभी तो परबतिया कब आयी, उसे पता भी न चला. कमरे का दिया भी परबतिया के साथ आयी हवा में बुझ गया था. अंधेरे में पता नहीं चल रहा था कि वह जग रहा है या सो रहा है. अतः टोह लेने के लिए वह बोली- ‘सो गये क्या?’ ‘नहीं तो, ऐसे ही लेटा हूं.’ बिना कोई हरकत किये वह बोला. परबतिया को तो बात बढ़ानी थी इसलिए फिर बोली- ‘क्या सोच रहे हो?’

‘कुछ तो नहीं...’

‘फिर बोलते क्यों नहीं?’

‘क्या बोलूं?’

‘सुबह चले जाओगे क्या?’

वह कुछ देर तक सोचता रहा, फिर बोला- ‘हाँ, छुट्टी कल ही तक तो है...परसों से ड्यूटी करनी है.’

सुबह के बिछोह की कल्पना की नागिन ने डस लिया. परबतिया के मुंह से निकला- ‘कुछ दिन और रुक क्यों नहीं जाते?’

पीड़ा उसे भी साल रही थी, लेकिन करे क्या... पेट जो बीच में आ जाता है. फिर भी दुःखते मन से कहा- ‘कैसे रुकूं?’ छुट्टी भी बाकी नहीं है. रुक जाऊंगा, तो पैसा कट जायेगा, फिर, यहां बहुत दिक्कत हो जायेगी. वैसे जैसा तुम कहो?’

‘मैं क्या कहूं? तुम तो खुद ही समझदार हो. परसों चंदर आया था. कह रहा था कि तिवारी के यहां से जमीन छुड़ा लो. वह बटाई पर जोतने को तैयार है?’ फिर अपनी सलाह देते हुए कहा- ‘अच्छा भी रहेगा, चार-छः कुंटल अनाज तो साल में घर में आ जायेगा. अभी तो यही देखना पड़ता है कि कब मनीआर्डर आये कि घर में दाना आवे.

इसलिए तो जा रहा हूं कि तुम लोगों को तकलीफ न हो.

फिर दोनों विवशता की चादर में सिकुड़ सिमट रहे.

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