गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : प्रदीप कुमार // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

प्रदीप कुमार

विद्रोह

मास्साब की आदतों में कोई सुधार नहीं आ रहा था वो रोज झाड़ू हाथ में पकड़वा कर स्कूल साफ करवाते थे. भला उन्हें मना कौन करे. जो भी मना कर देता उसे बेरहमी से पीटते थे। हरिदास सिंह की पोस्टिंग चतेला के पास अपने गांव कानाखेड़ा में ही हो गयी थी. घर में राजसी ठाटबाट... ऊपर से ठाकुरैसी गांव में दम से चलती थी। सुबह स्कूल में राजेंद्र को झाड़ू लगाने का आदेश दिया लेकिन उसने मना कर दिया जिससे उसने पास बुलाकर पेट की खाल तानते हुए बोला- अबे चमरे! तुम लोग पढ़ाई करोगे तो हमारी गाय कौन चरायेगा, बक्खर कौन हकेगा? जैसे-जैसे वह खाल तानता था राजेंद्र ऊपर की ओर खड़ा हो जाता था।

वह मन ही मन आग बबूला हुआ जा रहा था. उसकी हालत खराब हो गयी थी. आठ साल का बालक तीस साल के द्रोणाचार्य की गिरफ्त में था. वह विद्रोह की मुद्रा में उससे छूटना चाह रहा था. जैसे ही मास्साब ने उसे छोड़ा उसकी आँखें क्रोध से लाल हो गयीं. उसने सोच लिया था या तो पढ़ाई छूटेगी या इस मास्साब का सिर फूटेगा। छूटते ही वह स्कूल से बाहर की दौड़ा. उसे एक अधुवा गुम्बा मिल गया. आव देखा न ताव राजेन्द्र ने मास्साब के सिर पर गुम्बा दे मारा।

नशाखोरी

मैं मित्र मनीष के साथ स्टेशन पर बैठकर ट्रेन का इंतजार कर रहा था, तभी मेरी नजर पाँच छः किशोरों पर पड़ी... मटमैले कपड़े, चिपके गाल, सूखे होंठ ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उनके शरीर से खून का प्रत्येक कतरा निकाल लिया हो... आपस में लड़ते झगड़ते। मैं उनकी प्रत्येक हरकत पर नजर रखे हुए था. उनमें से एक लड़के ने एक बोतल निकाली, दूसरे ने टायर को चिपकाने वाला सॉल्यूशन निकाला जिसे बोतल में डालकर पानी के साथ मथने लगे. इसके बाद सभी ने छोटे से मटमैले कपड़े को उस पानी को भिगोकर सभी नाक में लगा लगाकर सूंघने लगे. धीरे-धीरे वे सभी मदहोश हो गए मदहोशी में ही बड़े बच्चे छोटों को छेड़ने लगे, कामुकता को जाग्रत करने लगे। वे लेटे-लेटे मां-बहिन की गाली बके जा रहे थे। मैंने मनीष से पूछा- यह क्या है? उसने बताया कि यह सॉल्यूशन का नशा है जो सबसे अधिक गंदा एवं बालकों में विकृति उत्पन्न करने वाला है. नशे एवं कामुकता से भरे वे युवा बेहाल थे. अभाव से भरा बचपन व्यक्ति को अपराध की ओर अग्रसर कर देता है और यही स्थिति इन बच्चों की थी।

थोड़ी देर बाद जैसे ही ट्रेन आई, वे सभी ट्रेनों के अलग-अलग डिब्बों में अपनी अपनी झाड़ू ले जाकर झाड़ू लगाने लगे एवं नशे की जुगाड़ हेतु हाथ फैलाने लगे।

संपर्क : गांधी महाविद्यालय, उरई, जालौन (उ.प्र.)

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