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लघुकथाएँ : डॉ. पुष्पा जमुआर // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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डॉ. पुष्पा जमुआर

जन्म : 5 जनवरी 1956, सालिमपुर, आरा (बिहार)

उपलब्धियां : कविता संग्रह-1, हाइकू संग्रह-1, तॉका संग्रह-1, लघुकथा संग्रह-1. संपादित लघुकथा संग्रह ‘आस-पास की बातें’

संपर्कः ‘काशी निकेतन’, राम सहाय लेन, महेन्द्रू, पटना-800006(बिहार)

डॉ. पुष्पा जमुआर

पेंशन

"देखिए! घबराने से कुछ नहीं होगा... हम पूरी कोशिश कर रहे हैं. अस्सी पार कर चुके हैं, फिर भी भगवान पर भरोसा रखें." डॉ. ने ढांढ़स बंधाते हुए भगवती देवी से कहा.

"डॉक्टर! मेहरबानी करके इन्हें बचा लीजिए, फिर चाहे मेरी जान ले लीजिए..."

"हमारा काम अच्छे-से इलाज करना है, किसी की जान लेना नहीं. आप बाहर बैठिए, मुझे अपना काम करने दीजिए..."

भगवती देवी बाहर तो नहीं गयीं, उसके बेटा-बहू अन्दर आ गए, "डाक्टर साहब! पापा को बचा लीजिए." डॉक्टर ने बेटे को नीचे से ऊपर तक देखा और कहा, "देखिए, इनके बचने की आशा कम है...फिर भी...!"

डॉक्टर की बात सुनकर बेटा-बहू उदास हो गए और बाहर निकलते हुए आपस में बात करने लगे, "अरे पापा की जगह मां चली जाती तो क्या हो जाता... पापा तो जब तक जीएंगे, पूरी पेंशन घर आती रहेगी. हम पर इन लोगों का कोई बोझ तो नहीं होगा... पापा के जाने पर तो मां को आधी पेंशन ही मिलेगी, उसमें तो उसी का खर्च मुश्किल से पूरा होगा." पीछे-पीछे आ रही मां ने उनकी बातें सुन लीं और पुनः पति के पास कमरे में लौट गयीं.

"क्या बात है भगवती, तुम कुछ ज्यादा ही परेशान हो..." उत्तर में भगवती ने सारी बातें बता दीं... जिसे सुनकर पापा अपने भीतर कुछ ऐसा डूबे कि फिर कभी नहीं उठे... और भगवती देवी ने जैसे ही पति को देखा कि वे नहीं रहे... वे भी एकाएक जमीन पर गिर गिरीं और फिर कभी नहीं उठीं...

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मां के गिरने की आवाज से बहू-बेटा दोनों भागे हुए अंदर आये. मम्मी-पापा को मृत देखकर बोले, "अरे! पूरी तो पूरी यह तो आधी पेंशन भी गयी.

धर्म

पंजाब से गुजरती ट्रेन में अमरजीत सिंह ने बगल में बैठी अकेली युवती से छेड़छाड़ शुरू कर दी. लड़की ने विरोध किया तो उसने एक चांटा उसके गाल पर जड़ दिया. वह युवती चिल्ला पड़ी, "अरे! मार डाला!"

चिल्लाहट सुनकर सामने बैठे सरदार जी ने देखा तो उन्हें मामला समझते देर न लगी... वे अपनी बर्थ से उठे और अमरजीत सिंह को पकड़कर लगे पीटने... वे पीटते ही जा रहे थे. उसे पिटते देख दो-तीन सज्जन आगे आये, "अरे सरदार जी! ये बच्चा भी अपना ही भाई है. इसे छोड़ दो..."

"अपना भाई है, इसीलिए तो उसे पीट रहा हूं. इसकी जगह मेरा बेटा या भाई होता तो शायद जान से मार देता... हमारे गुरूओं ने हमें रक्षा करना सिखाया है, अत्याचार नहीं..." यह सुनकर आगे आये सज्जन अपनी-अपनी जगह पर जा बैठे और सरदार जी ने उस अमरजीत सिंह को अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही उतार दिया.

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