लघुकथाएँ : डॉ. किशनलाल शर्मा // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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डॉ. किशनलाल शर्मा

जन्म : 18 जुलाई 1950

उपलब्धियां : पर्दे के पीछे (लघुकथा संग्रह) मैं द्रौपदी नहीं हूं. (कहानी संग्रह) नीम का पेड़ (कहानी संग्रह), तीन कहानी संग्रह, तीन लघुकथा संग्रह प्रकाशित.

संपर्कः 103 रामस्वरूप कॉलोनी आगरा-282010

डॉ. किशनलाल शर्मा

कुरुक्षेत्रे

‘तुम पर गोली चलाने का मतलब है, अपनी बहन का सुहाग उजाड़ना, लेकिन बहन से पहले मेरा कर्त्तव्य मातृभूमि के प्रति है. मैं अपनी मातृभूमि पर दुश्मन के नापाक कदम हर्गिज नहीं पड़ने दूंगा.’

दोनों पड़ोसी देशों के सम्बंध अच्छे नहीं थे. आये दिन सीमा पर गोलाबारी होती रहती थी. जब तब दोनों देशों के हुक्मरान एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलते रहते थे. दोनों देशों के बाशिन्दे भी एक-दूसरे को अविश्वास भरी नजरों से देखते थे. मीडिया मरहम की जगह आग लगाने का काम करता था.

दोनों देशों के बीच नफरत और तनाव का माहौल होने के बावजूद ‘क’ की बहन को पड़ोसी देश के ‘ब’ से प्यार हो गया और वे साले बहनोई बन गये. दोनों देशों के सम्बंध चाहे जैसे थे, लेकिन साले बहनोई में प्यार था. दोनों एक-दूसरे पर जान छिड़कते थे और एक-दूसरे के लिये कुछ भी कर गुजरने के लिये तैयार थे.

समय गुजरने के साथ पड़ोसी देशों के सम्बंध इतने बिगड़े कि युद्ध छिड़ गया. ‘क’ और ‘ब’ अपने देश के सैनिक के रूप में सीमा पर आमने-सामने खड़े थे. ‘क’ की बात सुनकर ‘ब’ बोला.

‘तुम पर गोली चलाने का मतलब है, रिश्ते का खून करना. स्वजन की हत्या का दोष अपने सिर पर मढ़ना. लेकिन तुम मेरे साले नहीं, दुश्मन के रूप में मेरे सामने खड़े हो. सैनिक के नाते मेरा कर्त्तव्य है, दुश्मन से देश की रक्षा करना.’

‘क’ और ‘ब’ की बंदूक से एक साथ गोली चली थीं और....

प्रवंचना

घंटी की आवाज सुनकर ज्यों ही लता ने गेट खोला, एक युवती घबराई सी अंदर चली आई. लता ने उस युवती की तरफ प्रश्नसूचक नजरों से देखा.

‘मेरे पीछे कुछ गुण्डे पड़े हैं. वे इधर ही आ रहे हैं. युवती डरी सहमी सी लग रही थी.

‘तू अंदर कमरे में चली जा.’

युवती को अंदर भेजकर लता ने गेट बंद कर लिया. उसे कदमों की आहट सुनाई पड़ी. तीन लोग उसके गेट के बाहर आकर खड़े हो गये. उनमें से एक बोला, ‘आयी तो इधर ही थी. कहां गायब हो गई?’

‘कब तक बचेगी? आज नहीं तो कल पकड़ ही लेंगे.’ और वे चले गये.

‘बाहर आ जा, वे लोग गये.’ उनके जाने के बाद लता बोली.

‘आप कितनी अच्छी हैं? आपने मुझे आज बचा लिया. वरना वे जाने क्या करते?’ कमरे से बाहर आकर लता से चिपकते हुये वह बोली.

उसके हाथ से आ रही खुशबू से लता बेहोश हो गई. होश आया तब तक पूरा घर साफ हो चुका था.

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