बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : डॉ. अनुज प्रभात // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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डॉ. अनुज प्रभात

जन्म : 1 अप्रैल, 1954

उपलब्धियां : आधे-अधूरे स्वप्न (कविता संग्रह) बूढ़ी आंखों का दर्द एवं नील पारवी (कहानी संग्रह).

प्रबंधन- सचिव रेणु स्मृति पुंज फारबिसगंज (अररिया)

संपर्कः दीन दयाल चौक, फारबिसगंज (अररिया)

पिन- 854318,

डॉ. अनुज प्रभात

तीसरी पीढ़ी

‘सुना तुमने जुगेसर की मां मर गई. फिर आयेगा मांगने. अब तक तो बीसों बार ले गया. लौटाया एक बार भी नहीं. लिखकर रखा भी है या नहीं. कितने रुपये हुए?’ वर्मा जी की धर्मपत्नी क्रोध से तमतमाते स्वर में बोली.

सच भी था जुगेसर को जब कहीं से कोई जुगाड़ नहीं होता तब वर्मा जी के पास चला आता. कभी बच्चे की बीमारी को लेकर... तो कभी पत्नी के... तो कभी अपने को खाँसता हुआ दिखाकर...

हर बार वर्मा जी उसे कुछ न कुछ देते और एक पहर तक पत्नी का क्रोध झेलते. इसलिए आज उनकी धर्मपत्नी जी को जैसे पता लगा कि जुगेसर की मां मर गई है, पहले से ही सतर्क करने लगी. फिर उसने एक हिदयत भी दे डाली- ‘उछलकर वहां मत चले जाना, तुम्हारी तो आदत है... कहीं कुछ हुआ दौड़ गए... चुपचाप घर में रहो... जब कोई आएगा तब, देखा जायेगा.’

अभी उनकी बातें खत्म भी नहीं हुई थी कि जुगेसर का बेटा मानव आ गया. बोला- ‘चाचा जी, दादी गुजर गई हैं पिताजी नहीं आयेंगे. मुझे पता है... बार-बार कर्ज लेकर उन्होंने चुकता नहीं किया. लेकिन मैं दादी की तीसरी पीढ़ी हूं. तीन पीढ़ी के ऋण का बोझ चौथी पीढ़ी पर नहीं डालूंगा. दादी ने एक बार कहा था- ‘दादा की जान आपके पिताजी ने बचाई थी.’

वर्मा जी अवाक थे, बालक सब जान रहा था. अभी वे कुछ सोच ही रहे थे कि धर्मपत्नी जी ने कुछ रुपये लाकर उस बच्चे के हाथ में दे दिया और कहा- ‘चिंता मत करो जो भी दिक्कत हो बोलना. बेटा हम तुम्हारे साथ हैं.’

वर्मा जी ने देखा उसकी आंखों में आंसू है. शायद नारी के कोमल हृदय ने तीसरी पीढ़ी को समझ लिया था.

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