मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–8 : 2 नाई की घड़ी // सुषमा गुप्ता

2 नाई की घड़ी[1]

clip_image002यह एक ऐसे नाई की कहानी है जिसके पास एक ऐसी घड़ी थी जो सदियों से बिना चाभी लगाये चलती चली आ रही थी।

इतने सालों में वह घड़ी न तो कभी रुकी और न ही कभी सुस्त ही हुई बल्कि हमेशा ही ठीक समय देती रही।

उस नाई ने उसको केवल एक बार चाभी लगायी थी और बस उस समय से वह टिक टौक, टिक टौक, टिक टौक चलती ही रही।

यह नाई एक बूढ़ा था और इतना बूढ़ा था कि वह तो उन सदियों की गिनती ही भूल गया था जबसे वह ज़िन्दा था और उसको यह भी याद नहीं था कि उसने कितनी पीढ़ियाँ आती जाती देखी थीं।

इस घड़ी की एक खासियत और भी थी कि यह घड़ी केवल समय ही नहीं बताती थी बल्कि समय के साथ साथ और भी बहुत कुछ बताती थी सो सारे लोग उसकी दूकान पर उस घड़ी से कुछ भी जानने के लिये आने के आदी हो चुके थे।

एक दिन उसकी दूकान पर एक बड़े शरीर वाला किसान आया। उसको उससे अपने खेत में बीज बोने के लिये बारिश का समय पूछना था।

अब तक आसमान बादलों से खाली था सो वह उस नाई की घड़ी से बोला — “ओ घड़ी ओ घड़ी, मुझे बताओ कि बारिश कब होगी?” घड़ी बोली —

टिक टौक, टिक टौक, टिक टौक

मैं चमकती हूँ मैं चमकती हूँ मैं चमकती हूँ

बारिश नहीं, बारिश नहीं, आसमान मेरा है

आओ कड़क, आओ कड़क, अगले साल पानी पानी पानी

फिर एक बूढ़ा छड़ी ले कर आया। वह अस्थमा का मरीज था इसलिये वह ठीक से साँस भी नहीं ले पा रहा था। उसने घड़ी से पूछा — “घड़ी ओ घड़ी, क्या मेरे लैम्प में तेल काफी है।” तुरन्त ही घड़ी बोली —

टिक टौक, टिक टौक, टिक टौक

तीन बीसी[2] तीन बीसी तीन बीसी तेल कम है थोड़ा और डालो

तीन बीसी से ऊपर, तीन बीसी से ऊपर, तीन बीसी से ऊपर

बेचारी बत्ती, बेचारी बत्ती, बेचारी बत्ती, टिक टौक, टिक टौक, टिक टौक

इसके बाद वहाँ एक नौजवान आया जो किसी लड़की से प्यार करता था और उस समय उसके प्यार में हवा में उड़ रहा था। वह बोला — “ओ घड़ी मुझे बताओ कि क्या कोई और दूसरा है जो अपने प्यार में इतना सफल हो जितना कि मैं?” घड़ी बोली —

टिक टौक, टिक टौक, टिक टौक

तुम अगर बेवकूफी करोगे तो नीचे गिरोगे

आज तुम नाच में अपनी बदनामी कराओगे

और कल तुम मखमल के नीचे लेटोगे[3]

clip_image004उसके बाद एक और आदमी आया जो सबसे ज़्यादा कानून तोड़ता था। वह कैमोरा[4] का सरदार था। उसकी टोपी में बहुत सारे फुँदने[5] लटके हुए थे। उसके बाल लम्बे और काले थे। उसके हाथ में कई अँगूठियाँ थीं।

वह बोला — “ओ घड़ी, मुझे बताओ कि कितने राजा मेरी पकड़ से बाहर निकल जायेंगे? बोलो नहीं तो मैं तुम्हें तोड़ डालूँगा।” घड़ी बोली —

टिक टौक, टिक टौक, टिक टौक

बचो बचो बचो ज्वार भाटे की बारी है, जलोगे, तुम जल जाओगे

उसके बाद एक गरीब आदमी आया – दुखी, भूखा, बहुत थोड़े से कपड़े पहने हुए, बीमार। वह आ कर बोला — “ओ घड़ी, मुझे बता मेरी ये सब परेशानियाँ कब दूर होंगी? बता बता। मेरे ऊपर दया करके बता। मुझे मौत कब आयेगी?” जैसे घड़ी बोलती थी वैसे ही वह बोली —

टिक टौक, टिक टौक, टिक टौक

जो गाना नहीं गाता उसके लिये ज़िन्दगी बहुत लम्बी होती है

इस तरह सब तरह के लोग इस जादुई घड़ी को देखने के लिये आते रहते थे। वे उससे बात करते, सवाल पूछते और अपने अपने सवालों के जवाब ले कर चले जाते।

वह घड़ी उनको यह बताती कि पेड़ों पर फल कब लगेंगे, जाड़ा या गरमी कब शुरू होगी, सूरज कब निकलेगा या कब डूबेगा और लोग कब तक ज़िन्दा रहेंगे।

कम में लिखा जाये तो उस घड़ी के मुकाबले की कोई दूसरी घड़ी और थी ही नहीं। वह अपने किस्म की एक अकेली घड़ी थी और इस दुनिया में कोई ऐसी बात नहीं थी जो वह न जानती हो।

हर आदमी उसको लेना चाहता था और अपने घर में रखना चाहता था पर उसको रख नहीं सकता था क्योंकि वह एक जादू की घड़ी थी। और इसी लिये उसको अपने घर में रखने की इच्छा करना भी बेकार था।

पर हर एक, चाहे वह चाहे या न चाहे, खुले रूप से या छिपे रूप से, उस नाई की तारीफ करता था जिसने वह घड़ी बनायी थी। वह हमेशा चलती ही रहती थी। कोई उसको तोड़ नहीं सकता था और न ही कोई उसको ले सकता था – सिवाय उस आदमी के जिसने उसको बनाया था।

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[1] The Barber’s Timepiece (Story No 166) – a folktale from Italy from its Palermo area.

Adapted from the book : “Italian Folktales”, by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[2] Beesee means 20 or score.

[3] Velvet for spreading over a coffin

[4] Camorra

[5] Tassels – see their picture above.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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