मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–8 : 4 सात मेमनों के सिर // सुषमा गुप्ता

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4 सात मेमनों के सिर[1]

एक बार एक बुढ़िया थी जो अपनी पोती[2] के साथ रहती थी। उसकी वह पोती हमेशा घर में ही रहती थी और घर का सारा काम करती थी जबकि वह बुढ़िया बाजार का काम करती थी।

एक दिन वह बुढ़िया बाजार से छोटे छोटे मेमनों के सात सिर ले कर आयी। उनको ला कर उसने अपनी पोती को दे दिये और बोली — “अतानाशिया[3], मैं बाहर जा रही हूँ। इन सातों सिरों को पका लेना। जब मैं वापस आ जाऊँगी तब हम दोनों मिल कर इन्हें खायेंगे।”

यह कह कर वह बुढ़िया तो चली गयी और उस लड़की ने उन सातों सिरों को आग पर पकने के लिये रख दिया। वहीं पास में एक बिल्ला बैठा था। मेमनों के सिरों के पकने की खुशबू जो उसकी नाक तक पहुँची तो वह बोला — “म्याऊँ म्याऊँ, म्याऊँ म्याऊँ। आधा मेरे लिये और आधा तेरे लिये।”

सो उस लड़की ने सात मेमनों के सिरों में से एक सिर उठाया, उसके आधे आधे दो हिस्से किये और उनमें से एक आधा बिल्ले को दे दिया और दूसरा आधा खुद खा लिया।

बिल्ले ने उसको खा कर फिर कहा — “म्याऊँ म्याऊँ, म्याऊँ म्याऊँ। आधा मेरे लिये और आधा तेरे लिये।”

लड़की ने फिर दूसरा सिर दो हिस्सों में काटा। उसका एक आधा हिस्सा उसने बिल्ले को दिया और दूसरा आधा हिस्सा खुद खा लिया।

पर बिल्ले का पेट अभी भी नहीं भरा था सो उसने एक बार और कहा — “म्याऊँ म्याऊँ, म्याऊँ म्याऊँ। आधा मेरे लिये और आधा तेरे लिये।”

इस तरह उस लड़की ने सातों सिर आधे आधे किये और उनमें से एक आधा बिल्ले को दे दिया और दूसरा आधा खुद खा लिया।

जब सारे सिर खत्म हो गये तब लड़की को चिन्ता हुई कि यह उसने क्या किया। वह अपना सिर खुजलाने लगी और बोली — “अब जब दादी वापस आयेगी तब मैं उससे क्या कहूँगी।”

काफी सोचने पर भी जब उसको इस सवाल का जवाब नहीं मिला तो वह घर से भाग गयी।

जब दादी घर वापस आयी तो उसने देखा कि घर का दरवाजा खुला पड़ा है। मेमनों के सिरों की आधी हड्डियाँ फर्श पर बिखरी पड़ी हैं और बाकी की आधी एक प्लेट में पड़ी हैं और उसकी पोती का कहीं पता नहीं है।

वह बुड़बुड़ा रही थी — “उसने आखिरी सिर भी खा लिया, उसने आखिरी सिर भी खा लिया।”

गुस्से के मारे उसने घर की सारी चीज़ें इधर उधर फेंकनी शुरू कर दीं और बुड़बुड़ाती रही — “उसने आखिरी सिर भी खा लिया, उसने आखिरी सिर भी खा लिया।” फिर वह भी बिना देखे बिना सोचे समझे कि वह कहाँ जा रही है घर के बाहर चली गयी।

वह कुछ ही दूर गयी होगी कि उसके दिमाग में कुछ आया तो वह सिर हिला कर फिर बोली — “उफ़, उसने तो आखिरी वाला सिर भी खा लिया।” वह किसी तरह भी शान्त नहीं हो पा रही थी।

इसी बीच अतानाशिया भी चलते चलते एक जंगल में आ गयी। वहाँ उसने हजारों गुलाब खिले देखे। उनको देखते ही उसके मुँह से निकला — “ओह, ये गुलाब कितने सुन्दर हैं।”

उसके पास एक छोटा सा धागा था। उसने वह धागा लिया और उसमें कुछ गुलाब गूँथ कर अपने लिये एक मुकुट, एक हार और कलाई में पहनने के लिये दो कंगन बना लिये। उनको पहन कर वह एक पेड़ के नीचे लेट गयी। ठंडी ठंडी हवा लगी तो वह सो गयी।

सवेरे वहाँ का राजा शिकार खेलने निकला तो एक लड़की को एक पेड़ के नीचे सोते पाया। वह बहुत देर तक उसकी तरफ देखता रहा। वह लड़की उसको इतनी अच्छी लगी कि वह उससे प्यार करने लगा।

उसने उसको जगाया और बोला — “मैं यहाँ का राजा हूँ। क्या तुम मुझसे शादी करोगी?”

अतानाशिया बोली — “आप देख रहे हैं कि मैं एक बहुत ही गरीब लड़की हूँ। मैं तो आपसे शादी करने की सोच भी नहीं सकती।”

राजा बोला — “अगर केवल यही बात तुमको परेशान कर रही है तो इस बात को तो तुम सोचो भी नहीं, बस हाँ कर दो। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी पत्नी बन जाओ।” लड़की का चेहरा शरम से लाल हो गया और उसने हाँ में सिर हिला दिया।

राजा बोला — “तो चलो उठो, और मेरे साथ मेरे महल चलो।”

लड़की बोली — “हाँ हाँ, पर मैं अपनी दादी को घर में छोड़ आयी हूँ मुझे पहले उसको लेना होगा।”

राजा ने एक गाड़ी उसकी दादी को लाने के लिये भेज दी और शादी की दावत के दिन उसको उसकी पोती के पास ही बिठा दिया। दावत बहुत ही बढ़िया थी।

बुढ़िया अपनी पोती की तरफ झुकी और उसके कान में फुसफुसायी — “तुमने तो आखिरी वाला भी खा लिया।”

पोती ने उसको झिड़का — “चुप रहो, अब बस भी करो।”

राजा ने पूछा — “तुम्हारी दादी क्या चाह रही है?”

लड़की बोली — “उसको मेरी पोशाक जैसी एक पोशाक चाहिये।” राजा ने हुकुम दिया कि ऐसी ही एक पोशाक इनके लिये भी बनवायी जाये।

दावत के बाद बातें शुरू हुई तो वह बुढ़िया बार बार अपनी पोती के कान में फुसफुसा रही थी — “तुमने तो आखिरी वाला भी खा लिया। तुमने तो आखिरी वाला भी खा लिया।”

इस तरह फुसफुसाते देख कर राजा ने अपनी पत्नी से फिर पूछा — “अब तुम्हारी दादी को क्या चाहिये?”

अतानाशिया बोली — “उनको मेरी अँगूठी जैसी एक अँगूठी चाहिये।” राजा ने हुकुम दिया कि ऐसी ही एक अँगूठी इनके लिये भी बनवायी जाये।

पर उस बुढ़िया ने फिर से अपनी पोती के कान में फुसफुसाना शुरू कर दिया तो बेचारे राजा ने अपनी पत्नी से फिर पूछा — “अब तुम्हारी दादी को क्या चाहिये?”

पर अतानाशिया के लिये यह सब अब काफी हो चुका था सो वह बोली — “वह भूखी हैं और इतना सारा स्वादिष्ट खाना खाने के बाद भी इनका दिमाग उन बेकार के मेमनों के सिरों से नहीं हटता जो इन्होंने मुझे पकाने के लिये दिये थे।”

राजा को ऐसे लालच पर गुस्सा आ गया और उसने अपने चौकीदारों को बुला कर शहर के चौराहे पर उसका सिर काटने का हुकुम दे दिया। चौकीदारों ने वही किया जो राजा ने कहा।

clip_image002जहाँ उस बुढ़िया का सिर गिरा वहाँ एक वीपिंग विलो का पेड़ उग आया। हवा के हर झोंके के साथ उस पेड़ में से आवाज आती है “जिसने आखिरी भी खा लिया। जिसने आखिरी भी खा लिया।”



[1] The Seven Lamb Heads (Story No 170) – a folktale from Italy from its Ficarazzi area.

Adapted from the book : “Italian Folktales”, by Italo Calvino”. Translated by George Martin in 1980.

[2] Son’s daughter

[3] Atanasia – the name of the granddaughter of the old woman.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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