मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–8 : 7 मुर्गीखाने में राजा का बेटा // सुषमा गुप्ता

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7 मुर्गीखाने में राजा का बेटा[1]

कुछ ऐसा कहा गया है कि इटली के किसी शहर में एक चमार रहता था। उसके तीन बेटियाँ थीं – पैप्पा, नीना और नूनज़िया[2]। वे लोग बहुत गरीब थे। हालाँकि वह चमार जूते ठीक करने के लिये गाँव में भी जाता था पर फिर भी उसकी आमदनी बहुत कम होती थी।

उसको घर में पैसा न लाते देख कर उसकी पत्नी बहुत गुस्सा होती — “अरे अभागे, आज मैं क्या पकाऊँगी और तुम सबको क्या खिलाऊँगी?”

रोज रोज की इस लड़ाई से वह चमार तंग आ गया था सो एक दिन उसने अपनी सबसे छोटी बेटी नूनज़िया से कहा — “सुन बेटी, क्या तू कुछ लाने के लिये मेरे साथ चलेगी जिससे हम सूप बना सकें?”

“हाँ हाँ पिता जी चलिये।”

सो दोनों कुछ पत्ते इकठ्ठे करने के लिये खेतों की तरफ चल दिये। वे पत्ते ढूँढते ढूँढते खेत के आखीर तक चले गये। तभी नूनज़िया ने एक सौंफ़[3] का पेड़ देखा। वह इतना बड़ा था कि काफी कोशिशों के बाद भी वह उसे न उखाड़ सकी।

उसने अपने पिता को पुकारा — “पिता जी पिता जी, देखिये तो जरा मुझे क्या मिला। पर मैं इसको उखाड़ ही नहीं पा रही हूँ।”

उसका पिता थोड़ी दूर आगे था सो वह वापस लौट कर आया और उसने भी उस पेड़ को उखाड़ने की कोशिश की पर वह भी उस पेड़ को बहुत कोशिशों के बाद ही कहीं उखाड़ सका।

उस पेड़ की जड़ के नीचे एक चोर दरवाजा था। वह दरवाजा खुला हुआ था और उसी के पास एक नौजवान खड़ा हुआ था।

उस नौजवान ने पूछा — “अगर तुम लोग भूख से मर रहे हो तो मैं तुमको अमीर बना सकता हूँ। तुम अपनी बेटी को यहाँ छोड़ जाओ और मैं तुमको एक थैला भर कर पैसे दे देता हूँ।”

गरीब चमार ने आश्चर्य से कहा — “क्या? मैं अपनी बेटी को यहाँ तुमको दे जाऊँ?”

पर उस नौजवान ने जब उसको समझाया तो पिता ने पैसों का थैला उससे ले लिया और अपनी बेटी को वहाँ छोड़ कर चला गया। नूनज़िया उस नौजवान के पीछे पीछे उस तहखाने में चली गयी।

नीचे तहखाने में तो बहुत ही आरामदेह घर था। उसने तो ऐसे घर के बारे में कभी सोचा ही नहीं था। वह तो जैसे स्वर्ग में आ गयी थी। उसकी ज़िन्दगी तो जैसे सुखों से भर गयी थी। पर फिर भी बस वह अपने पिता और बहिनों को बहुत याद करती थी।

उधर वह चमार अब बहुत अमीर हो गया था और उसके घर में मुर्गा और गाय का माँस रोज ही पकता था।

एक दिन पैप्पा और नीना ने अपने पिता से कहा — “पिता जी, हमारा अपनी बहिन नूनज़िया को देखने का मन करता है। क्या आप हमको उससे मिलाने ले चलेंगे?”

“हाँ हाँ क्यों नहीं।”

सो वे सब उस जगह गये जहाँ उन्होंने वह सौंफ का पेड़ देखा था। वह सौंफ का पेड़ अभी भी वहीं था। पिता ने वह सौंफ का पेड़ उखाड़ा और फिर उसके नीचे छिपा हुआ चोर दरवाजा खटखटाया।

नौजवान ने दरवाजा खोला और उन सबको प्रेम से अन्दर बुलाया। नूनज़िया अपनी बहिनों को देख कर बहुत खुश हुई और उनको अपना सारा घर दिखाया। पर उसमें एक कमरा ऐसा था जिसको उसने खोल कर दिखाने से मना कर दिया।

उसकी बहिनों ने पूछा — “पर तुम इस कमरे को क्यों नहीं खोल रहीं? ऐसा क्या है इसमें?”

उनको यह जानने की बड़ी उत्सुकता थी कि उस बन्द कमरे में क्या था और उनकी बहिन उस कमरे को क्यों नहीं खोल रही थी।

नूनज़िया बोली — “मुझे भी नहीं मालूम है कि इस कमरे में क्या है। मैं भी इस कमरे में पहले कभी नहीं आयी। मेरे पति ने मुझे इस कमरे में जाने से मना किया है।”

उसके बाद नूनज़िया अपने बाल बनाने जाने लगी तो उसकी बहिनों ने कहा कि आज हम तुम्हारे बाल बनाते हैं। जब बहिनों ने उसके बाल खोले तो उनमें उनको एक चाभी मिल गयी।

पैप्पा नीना के कान में फुसफुसायी — “यह देखा? लगता है यह चाभी जरूर ही उसी कमरे की है जिसे यह हमको दिखाना नहीं चाहती।”

उन्होंने चुपके से उसके बालों में से वह चाभी निकाल ली। उसके बाल बना कर वे चोरी से उस बन्द कमरे को खोलने और उस कमरे में क्या है यह देखने के लिये वहाँ से चली गयीं।

वह चाभी वाकई उसी कमरे की थी। उन्होंने वह कमरा खोला तो देखा कि उस कमरे में तो बहुत सारी स्त्रियाँ बैठी थीं। कुछ कढ़ाई कर रही थीं, कुछ सिलाई कर रही थीं और कुछ कपड़ा काट रही थीं। अपना अपना काम करते समय वे गा रही थीं –

हम कपड़ों के गठ्ठर बनाते हैं

और राजा के बेटे के आने का इन्तजार करते हैं

पैप्पा और नीना बोलीं — “ओह लगता है कि हमारी बहिन को बच्चे की आशा है और उसने हमें बताया भी नहीं।”

पर उसी समय कमरे में बैठी स्त्रियों को लगा कि कोई उनको देख रहा है तो वे सब खूबसूरत से बदसूरत हो गयीं और फिर गिरगिटों और हरे रंग के रेंगने वाले जानवरों में बदल गयीं। यह देख कर पैप्पा और नीना दोनों डर गयीं और वहाँ से भाग लीं।

उनको इस तरह परेशान हो कर भागते देख कर नूनज़िया ने उनसे पूछा — “जीजी, क्या बात है क्या हुआ?”

वे बोलीं — कुछ नहीं। हम अब घर वापस जाना चाहते थे सो हम तुमको विदा कहने आ रहे थे।”

“अभी से? इतनी जल्दीे?”

“हाँ हमें अब घर जाना चाहिये।”

“पर तुम लोगों को हुआ क्या है? तुम लोग इतनी डरी हुई क्यों हो?”

इस पर वे दोनों बोली — “नूनज़िया, हमको तुम्हारे बालों मे एक चाभी मिली। हमने वह निकाल ली और उस कमरे का दरवाजा खोल लिया जो तुम हमको दिखाना नहीं चाहती थीं।”

नूनज़िया बोली — “ओह जीजी यह तो तुमने मेरा सारा किया धरा बेकार कर दिया। उस कमरे में बैठी वे स्त्रियाँ तो परियाँ थीं। वे मेरे पति के पास गयीं और उन्होंने उनसे कहा — “तुमको अपनी पत्नी को यहाँ से निकालना पड़ेगा, अभी अभी।”

मेरे पति ने ऑखों में ऑसू भर कर पूछा — “मगर क्यों?”

वे बोलीं — “तुमको उसको तुरन्त ही वापस भेजना पड़ेगा। हुकुम तो हुकुम है। यह परियों का हुकुम है। नहीं तो हमारा काम खत्म।”

इस पर मेरे पति ने उन परियों को यहाँ कैदी बना कर रख लिया था। और आज आप लोगों ने उनको आजाद कर दिया। ओह आज मेरी बहिनों ने ही मुझे नीचे गिरा दिया।”

और इतना कह कर वह रो पड़ी — “अब मैं कहाँ जाऊँ।”

उसकी बहिनों को यह सुन कर बहुत दुख हुआ पर वे तो अब कुछ कर नहीं सकती थीं सो वे अपनी छोटी बहिन को वहीं रोता छोड़ कर अपने घर चली गयीं।

नौजवान ने लड़की को धीरज बँधाते हुए कहा — “रोओ नहीं। लो यह धागे का गोला लो। इसका एक सिरा हमारे घर के दरवाजे के हैन्डिल से बाँध दो और इस गोले को खोलती चली जाओ। जहाँ यह धागा खत्म हो जाये वहाँ रुक जाना।”

दुखी नूनज़िया ने उसका कहा माना। उसने उस धागे का एक सिरा अपने घर के दरवाजे के हैन्डिल में बाँधा और वह गोला खोलती चली गयी। पर उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वह धागा जाने कितना लम्बा था। वह तो खत्म होने पर ही नहीं आ रहा था।

चलते चलते वह एक बहुत ही आलीशान महल के नीचे से गुजरी तो वह धागा वहाँ पहुँच कर खत्म हो गया। वह महल राजा क्रिस्टल[4] का महल था।

नूनज़िया ने वहाँ जा कर आवाज लगायी तो कुछ दासियाँ बाहर निकल कर आयीं। नूनज़िया ने उनसे कहा — “मेहरबानी करके मुझे आज की रात ठहरने की जगह दे दो। मुझे बच्चा होने वाला है और मुझे नहीं मालूम कि मैं कहाँ जाऊँ।”

वे नौकरानियाँ राजा क्रिस्टल और उसकी रानी से यह कहने गयीं पर उन्होंने कहा कि वे जब तक आसमान में सूरज चमकता है तब तक किसी के लिये भी महल के दरवाजे नहीं खोलते।

इस बात से कई साल पहले कुछ परियाँ उनके बेटे को उठा कर ले गयी थीं। तबसे उन्होंने उसकी खाल या बाल कुछ भी नहीं देखा था। इसलिये वे लोग अजनबी स्त्रियों पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते थे।

बेचारी नूनज़िया बोली — “क्या मैं आपके मुर्गीखाने में रह सकती हूँ? बस एक ही रात की तो बात है।”

उन दासियों को उसके ऊपर दया आ गयी तो उन्होंने राजा से उसको ठहराने के लिये बार बार कहा और यह भी कहा कि अगर वह उसके लिये महल का दरवाजा नहीं खोल सकते तो कम से कम उसको अपने मुर्गीखाने में ही ठहरने की इजाज़त दे दें। सो उसको राजा के मुर्गीखाने में रहने की इजाज़त दे दी गयी।

दासियों ने देखा कि वह लड़की बहुत भूखी थी सो वे उसके लिये थोड़ी सी डबल रोटी और दूध ले गयीं।

वे उसकी कहानी भी सुनना चाहती थीं। पर जब उन्होंने उससे अपना हाल सुनाने के लिये कहा तो उसने ना में सिर हिलाया और बोली — “काश, तुम जान पातीं। ओह, काश तुम जान पातीं।”

उसी रात नूनज़िया ने एक सुन्दर बेटे को जन्म दिया। एक दासी यह खबर देने के लिये रानी के पास गयी — “मैजेस्टी, आपको उस बच्चे को जा कर देखना चाहिये जिसको उस विदेशी लड़की ने जन्म दिया है। वह बिल्कुल आपके बेटे की शक्ल का है।”

इस बीच परियाँ उस नौजवान के पास गयीं जो अभी भी उसी तहखाने में रह रहा था और बोलीं — “क्या तुम जानते हो कि तुम्हारी पत्नी ने एक सुन्दर बेटे को जन्म दिया है? क्या तुम आज रात उसको वहाँ जा कर देखना चाहोगे?”

नौजवान बोला — “अगर मैं उसे देखना चाहूँ तो क्या तुम मुझे वहाँ ले चलोगी?”

उस रात मुर्गीखाने के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी तो अन्दर से किसी ने पूछा — “कौन है?”

“दरवाजा खोलो। यह मैं हूँ, तुम्हारे बच्चे का पिता।”

नूनज़िया ने दरवाजा खोला और नूनज़िया का पति उसमें अन्दर घुसा। उसके पीछे पीछे परियाँ थीं।

यह नौजवान राजा का वही लड़का था जिसको कुछ साल पहले परियाँ उठा कर ले गयी थीं। आज वे ही परियाँ उसको उसके अपने बेटे को दिखाने के लिये उसके अपने ही घर वापस ले कर आयी थीं।

उसके अन्दर आते ही मुर्गीखाने में तुरन्त ही चारों तरफ भारी भारी परदे लग गये और नीचे फर्श पर सुनहरा कालीन बिछ गया। उसमें सोने के सोफे लग गये जिन पर सोने के तारों से कढ़े हुए कपड़े चढ़े थे। बच्चे का पालना भी सोने का हो गया।

वहाँ सब कुछ चमकने लगा। ऐसा लगा जैसे वहाँ दिन का उजाला छा गया हो.। संगीत बजने लगा और परियाँ नाचने गाने लगीं। राजकुमार ने अपने बेटे को गोद में लिया और उसको अपनी बाँहों में झुलाने लगा।

झुलाते समय वह गा रहा था —

काश अगर मेरे पिता को पता होता, कि तुम उनके बेटे के बेटे हो

तो वह तुमको सोने के कपड़ों में लपेटते, सोने के पालने में झुलाते

मैं तुम्हारे साथ दिन और रात रहता, सो जा ओ राजकुमार सो जा

और जब वहाँ सब नाच रहे थे तो परियाँ वहाँ से खिड़की के रास्ते बाहर निकल गयीं और गाने लगीं —

मुर्गों को अभी बाँग मत देने दो, और घड़ी को भी आगे मत बढ़ने दो

अभी समय नहीं आया है, अभी नहीं, अभी नहीं

X X X X X X X

इन लोगों को आनन्द मनाते हम यहीं छोड़ते हैं और महल में रानी के पास चलते हैं। एक दासी रानी के पास आयी और बोली — “रानी जी रानी जी, मैं आपको एक बात बताऊँ? यह सबसे अजीब बात है जो शायद आपने पहले कभी नहीं देखी होगी जो वहाँ हो रही है जहाँ वह विदेशी लड़की ठहरी हुई है।

वह मुर्गीखाना अब वह मुर्गीखाना नहीं रहा बल्कि वह तो स्वर्ग की तरह चमक रहा है। आप किसी को गाते सुन रही हैं न? और वह आपके बेटे जैसा गा रहा है, जरा सुनिये तो।”

यह सुन कर रानी उस मुर्गीखाने के दरवाजे तक गयी और वहाँ जा कर सुनने लगी पर उसी पल एक मुर्गे ने बाँग दी और उसके बाद न तो वह कुछ सुन सकी और न ही वहाँ पर उसको दरवाजे के नीचे से बिजली की सी कोई चमक ही दिखायी दी। सो वह वहाँ से ऐसे ही बिना कुछ देखे और सुने चली आयी।

सुबह को उसने खुद ही उस विदेशी लड़की के लिये उसकी सुबह की कौफी ले जाने का निश्चय किया।

जब वह उसकी कौफी ले कर उसके पास गयी तो उसने उससे पूछा — “क्या तुम मुझे बताओगी कि पिछली रात यहाँ कौन आया था?”

लड़की बोली — “वैसे तो मुझे यह बताने की इजाज़त नहीं है पर अगर मुझे यह बताने की इजाज़त होती भी तो भी मैं आपको क्या बताती। काश मैं खुद भी जान पाती कि वह सब क्या था।”

रानी ने पूछा — “पर वह कौन हो सकता है जो यहाँ आया था? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मेरा बेटा हो।”

और फिर वह कुछ कुछ बोलती रही। और वह इतना बोलती रही कि उसको रानी को अपनी सारी कहानी सुनानी पड़ी – शुरू से ले कर आखीर तक – पत्ते ढूँढने से ले कर बाद की सब घटनाओं के होने तक।

रानी बोली — “तो इसका मतलब यह है कि तुम मेरे बेटे की बहू हो।” कह कर उसने उस लड़की को गले से लगा लिया और चूम लिया।

फिर बोली — “आज की रात तुम उससे पूछना कि उसको इस जादू से आजाद कराने का क्या तरीका है।”

उस रात उसी समय परियाँ वहाँ फिर जमा हुईं और राजा के बेटे को भी साथ ले कर आयीं। वे नाच गा रही थीं और राजकुमार अपने बेटे को गोद में ले कर उसको झुलाते हुए गा रहा था —

काश अगर मेरे पिता को पता होता, कि तुम उनके बेटे के बेटे हो

तो वह तुमको सोने के कपड़ों में लपेटते, सोने के पालने में झुलाते

मैं तुम्हारे साथ दिन और रात रहता, सो जा ओ राजकुमार सो जा

जबकि परियाँ नाच रही थीं तो लड़की ने अपने पति से कहा — “मुझे यह बताओ कि तुम इन परियों के चंगुल से किस तरह से आजाद हो सकते हो?”

वह नौजवान बोला — “तुमको यह देखना है कि मुर्गा बाँग न दे, घड़ी का घंटा न बजे, घंटी न बजे। खिड़कियों को किसी गहरे रंग के परदों से ढक दो। उन पर चाँद सितारे कढ़े होने चाहिये ताकि तुमको यह पता न चले कि दिन कब निकला।

जब सूरज आसमान में चढ़ जाये तब वे परदे खींच लो तो ये परियाँ गिरगिटों और हरे रंग के रेंगने वाले जानवरों में बदल जायेंगीं और भाग जायेंगीं।”

लड़की ने यह बात रानी को बता दी। सुबह राजा ने अपने मुनादी करने वाले को बुलाया और उनसे कहा कि उसका यह हुकुम सबको सुना दिया जाये कि सारी घंटियाँ और घड़ियों को बन्द कर दिया जाये और सारे मुर्गे मार दिये जायें।

इस काम के लिये सब तैयारी हो गयी। उस रात हर रात की तरह परियाँ फिर से राजकुमार को ले कर वहाँ आयीं। उन्होंने फिर से नाचना शुरू किया और राजकुमार ने फिर से गाना शुरू किया —

काश अगर मेरे पिता को पता होता, कि तुम उनके बेटे के बेटे हो

तो वह तुमको सोने के कपड़ों में लपेटते, सोने के पालने में झुलाते

मैं तुम्हारे साथ दिन और रात रहता, सो जा ओ राजकुमार सो जा

परियाँ खिड़की की तरफ गयीं और उन्होंने गाना शुरू किया —

मुर्गों को अभी बाँग मत देने दो, और घड़ी को भी आगे मत बढ़ने दो

अभी समय नहीं आया है, अभी नहीं, अभी नहीं

वे सारी रात नाचते रहे और गाते रहे और यह देखने के लिये बराबर खिड़की की तरफ जाते रहे कि अभी भी रात है कि नहीं। उन्होंने फिर गाया —

मुर्गों को अभी बाँग मत देने दो, और घड़ी को भी आगे मत बढ़ने दो

अभी समय नहीं आया है, अभी नहीं, अभी नहीं

जब सूरज आसमान में चढ़ गया तो खिड़की पर लटके भारी भारी परदे खींच दिये गये सो कुछ परियाँ साँप बन गयीं, कुछ हरे गिरगिट बन गयीं, कुछ और रेंगने वाले जानवरों में बदल गयीं और वहाँ से भाग गयीं।

राजकुमार पर पड़ा जादू टूट गया और उसने अपनी पत्नी और बेटे के साथ महल में आ कर अपने माता पिता को गले लगाया। राजा रानी अपने खोये हुए बेटे को पा कर और पोते को देख कर बहुत खुश हुए।


[1] The King’s Son in the Henhouse (Story No 174) – a folktale from Italy from its Salaparuta area.

Adapted from the book : “Italian Folktales”, by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[2] Peppa, Nina and Nunzia – the names of the daughters of the cobbler

[3] Translated for the word “Fennel Seed”. See its plant’s picture above.

[4] King Crystal

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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