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देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–9 : 14 जौन बालेन्टो // सुषमा गुप्ता

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14 जौन बालेन्टो [1] एक बार एक बहुत छोटे से शहर में एक चमार रहता था। वह बहुत पुराने पुराने जूते ठीक करता था। उसका नाम था जौन बालैन्टो। हालाँक...

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14 जौन बालेन्टो[1]

एक बार एक बहुत छोटे से शहर में एक चमार रहता था। वह बहुत पुराने पुराने जूते ठीक करता था। उसका नाम था जौन बालैन्टो। हालाँकि वह साइज़ में बहुत छोटा था पर अक्लमन्द बहुत था।

एक दिन जब वह एक जूता सिल रहा था तो गलती से जूता सिलने वाली सुई उसकी उँगली में चुभ गयी। उसके मुँह से एक चीख सी निकल गयी “उफ़।”

उसकी यह चीख उसके पड़ोसियों ने सुन तो ली पर उस पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने चिन्ता ही नहीं की जौन बालैन्टो को क्या हुआ।

पर जौन बालैन्टो की चीखों ने वहाँ उड़ती हुई सारी मक्खियों की उत्सुकता जगा दी। वे तुरन्त ही उड़ कर जौन बालैन्टो के पास यह देखने के लिये आ गयीं कि उसको क्या हो गया।

उन मक्खियों में से एक मक्खी जौन बालैन्टो के घाव पर बैठ गयी और उसने उसके उस घाव से निकलता सारा खून चूस लिया। दूसरी मक्खी नूडिल्स[2] का एक कटोरा ले आयी और उसके ऊपर भिनभिनाने लगी।

जौन बोला — “अरे ये मक्खियाँ यहाँ क्या कर रही हैं। भागो भागो यहाँ से।” कह कर उसने चमड़े के एक टुकड़े से उनको उड़ाने की कोशिश की पर वे तो बहुत ही जिद्दी थीं। वे वहाँ से गयी नहीं। वे उस नूडिल्स के कटोरे के ऊपर भिनभिनाती ही रहीं।

जब वे वहाँ से नहीं गयी तो जौन बालैन्टो ने हाथ का घूँसा बना कर इतनी ज़ोर से उन मक्खियों को मारा कि उसके उस घूँसे से काफी मक्खियाँ मर गयीं।

उनको मार कर उसने जब जमीन पर पड़ी मरी हुई मक्खियाँ गिनी तो वे कम से कम 1000 तो होंगी। और 500 मक्खियों के करीब मक्खियाँ तो घायल भी हो गयी थीं।

उसने सोचा तो यह था मेरा एक ज़ोरदार घूँसा। लोग सोचते हैं कि मैं किसी काम का नहीं पर अगर मैं कोशिश करूँ तो मैं भी अपने आपको दिखा सकता हूँ कि मैं क्या हूँ।

फिर उसने एक सूखी हुई डंडी उठायी उसे स्याही में भिगोया और उससे एक कपड़े की बड़ी सी पट्टी पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा – “जौन बालैन्टो से मिलो जिसने अभी अभी 1000 मार दिये और 500 घायल कर दिये।”

उसने इस पट्टी को अपने टोप में लगा लिया जो वह उस समय पहने हुआ था। जिसने भी यह पढ़ा वही ज़ोर से हँस पड़ा और जौन से पूछा — “जौन कितने मारे?”

जौन बोला — “मैंने 1000 मारे और 500 घायल किये।”

इससे जौन बालैन्टो तो बहुत मशहूर हो गया। उसकी शोहरत एक मुँह से दूसरे मुँह तक होती हुई शहर भर में फैल गयी और फिर दूसरे शहरों में भी फैल गयी। एक साल के अन्दर अन्दर तो जौन बालैन्टो दूर दूर तक मशहूर हो गया।

इस बीच जौन ने अपना जूता सिलने का काम छोड़ दिया – जूते सिलने का धागा, चाकू, सुई आदि आदि सब उठा कर रख दिये और दूसरे देश में अपनी किस्मत आजमाने चल दिया।

वह एक बहुत ही पतले दुबले गधे पर चढ़ा जिसकी बस खाल और हड्डियाँ ही दिखायी दे रही थीं। न उसने अपने साथ कोई सामान लिया और न ही कोई पैसा बस वह तो चल दिया।

तीन दिन की जंगल की यात्रा के बाद वह एक सराय में आया। वह दरवाजे से ही चिल्लाया — “मैं जौन बालैन्टो हूँ जिसने 1000 मार दिये और 500 घायल कर दिये।”

इत्तफाक से वह सराय उस समय डाकुओं से भरी हुई थी। इतने बड़े हीरो का नाम सुन कर तो वहाँ रह रहे डाकू डर गये और तुरन्त ही उन्होंने अपने चमकते हुए हथियार और घोड़े तो वहीं छोड़े और सराय के दरवाजे और खिड़कियों से बाहर निकल कर चारों तरफ भाग गये।

जौन को अपने गधे से उतरने में थोड़ी देर लग गयी। गधे से उतर कर वह मेज पर पहुँचा तो सराय के मालिक ने कहा — “ओ बड़े आदमी, आइये और आप यहाँ पेट भर कर खाइये। मैं तो हमेशा आपका आभारी रहूँगा कि आपका नाम सुनते ही मेरी सराय से डाकू भाग गये।”

जौन बालैन्टो प्लेट की तरफ देखते हुए और खाना खाते हुए बोला — “दूसरे लोग तो मेरा जिस जिस तरीके से फायदा उठाते हैं उसके मुकाबले में यह तो कुछ भी नहीं है।”

जब जौन पेट भर कर खाना खा चुका तो उसने उन डाकुओं के घोड़ों में से सबसे बढ़िया घोड़ा लिया, उस पर सवार हुआ और सराय के मालिक से बोला — “अगर तुम्हें कभी भी किसी भी सहायता की जरूरत हो तो बस मुझे याद करना न भूलना।

जब तक मैं ज़िन्दा हूँ तब तक कोई भी तुमसे किसी भी तरह का कोई भी बुरा बरताव नहीं करेगा और करेगा भी तो बच कर नहीं जा सकता।”

कह कर उसने अपने घोड़े को एड़ लगायी और वहाँ से चल दिया। सराय के मालिक और उसके नौकरों के सिर उसके पीछे भी झुके के झुके रह गये।

जौन पहले कभी किसी घोड़े पर नहीं बैठा था इसलिये उसको घोड़े पर बैठना नहीं आता था। सो वह तो बस उस पर लटकता हुआ चला जा रहा था और उसके हर कदम पर हवा में कूद जाता था।

उसने सोचा — “ओ मेरे प्यारे औजारों, मैंने तुमको क्या सोच कर उठा कर रख दिया था?”

फिर भी वह उस पर चलता ही रहा और बाद में उस पर चढ़ने का आदी हो गया। वह जहाँ भी गया वहीं उसका बड़ी इज़्ज़त के साथ स्वागत हुआ।

clip_image006आखिर वह एक बड़े साइज़ के आदमियों[3] के शहर में पहुँच गया। जैसे ही उन्होंने जौन को देखा तो वे बड़े साइज़ के आदमी जो चेस्टनट[4] के पेड़ जैसे मजबूत थे और चीड़ के पेड़ जैसे लम्बे थे अपने बहुत बड़े बड़े मुँह खोलते हुए और अपने होठ चाटते हुए उसकी तरफ उसको खाने के लिये दौड़.े। जौन तो उनको देख कर पत्ते की तरह से काँप उठा।

बड़े साइज़ के आदमियों का सरदार बोला — “तो तुम्हीं वह जौन बालैन्टो हो जिसने 1000 मार दिये और 500 घायल कर दिये। क्या तुम मुझसे लड़ना पसन्द करोगे? चलो नदी के उस पार चलो उधर चल कर लड़ते हैं।”

जौन बोला — “सुनो सुनो। अच्छा हो कि अगर तुम मुझे शान्ति से मेरे रास्ते जाने दो। तुम्हें मालूम है कि मैं कैसा हूँ।

जैसे मिर्च को ही ले लो। मिर्च कितनी छोटी सी होती है पर बहुत ताकतवर होती है उसी तरह से मैं हूँ। मैं अगर एक बार अपनी तलवार छू दूँ तो बस फिर तुम्हें भगवान ही बचाये।”

यह सुन कर बड़े साइज़ वाले आदमियों ने इस पर विचार किया और फिर ज़रा नरम आवाज में बोले — “ठीक है ठीक है। हम तुम्हें तुम्हारे रास्ते जाने देंगे पर पहले तुम अपनी ताकत हमें साबित करके दिखाओ।

क्या तुम वह चट्टान वहाँ देख रहे हो? हम यह चाहते हैं कि तुम उस चट्टान को लुढ़का कर यहाँ ले आओ। अगर तुमने यह कर दिया तो हम तुमको अपना राजा बना लेंगे।”

जौन बालैन्टो ने अपने दोनों हाथों का एक प्याला बना कर अपने मुँह पर रखा और चिल्ला कर बोला — “रास्ते से हट जाओ। इस घाटी में हर रहने वाला अपनी जान बचा कर भागे।

शानदार जौन बालैन्टो अब इस बड़ी चट्टान को हिलाने वाला है जिससे कि लोग मर भी सकते हैं। भागो भागो हर आदमी भागो। अपनी जान बचा कर भागो।”

यह सुन कर उस घाटी में रहने वाले सारे लोग बेचारे अपने अपने परिवारों को ले कर वहाँ से भागने लगे।

जब इतने सारे लोग वहाँ से भागे तो बड़े साइज़ के लोग भी डर गये और वे भी वहाँ से भाग लिये। तुरन्त ही वहाँ से सारे लोग भाग रहे थे। भागते भागते वे चिल्लाते भी जा रहे थे —

“जौन बालैन्टो को देखो उसने 1000 मार दिये हैं और 500 घायल कर दिये हैं।”

देखते देखते सारा गाँव खाली हो गया। जब सारे लोग वहाँ से भाग गये तो जौन ने अपने घोड़े को एड़ लगायी, नदी पार की और शान्ति से उन बड़े साइज़ के आदमियों की जगह पार करके वहाँ से चला गया।

अब चट्टान को तो वहाँ से न हिलना था और वह न हिली। पर ऐसे कामों से उसकी शोहरत बढ़ती ही गयी बढ़ती ही गयी।

कुछ दूर जाने के बाद उसको दो सेनाएं मिलीं जो आपस में लड़ने के लिये तैयार खड़ी थीं। राजा वहाँ अपने जनरलों से घिरा खड़ा था पर वह लड़ाई के लिये बिल्कुल तैयार नहीं था।

क्योंकि अगर वह हार गया तो उसको अपना राज्य और ताज छोड़ना पड़ता और मरना पड़ता और यह वह करना नहीं चाहता था। इसलिये वह बहुत डरा हुआ था।

पर जैसे ही उसने जौन बालैन्टो को देखा तो उसको कुछ उम्मीद बँधी। उसने जौन से कहा — “ओ मशहूर जौन बालैन्टो। लगता है कि तुमको भगवान ने मेरी जीत के लिये ही इस समय यहाँ भेज दिया। मेहरबानी करके तुम मेरी सेना को सँभाल लो।”

अब जौन को लगा कि अब झूठ से काम नहीं चलने का, अब सच बोलने का समय आ गया सो वह बोला — “मैजेस्टी, मैं वह आदमी नहीं हूँ जो आप समझ रहे हैं। मैं तो एक गरीब चमार हूँ। मैं तो केवल अपने जूते में इस्तेमाल करने वाली सुई और धागा ही इस्तेमाल कर सकता हूँ।”

राजा ने उसे बीच में ही टोका — “हाँ हाँ सुन लिया। पर क्या हम ये बातें बाद में कर सकते हैं। अभी हमारे पास समय कम है। तुम हमारे जनरल का पद सँभालो और मेरी इस सेना को ले कर लड़ाई के लिये चलो।

यह रहा मेरा घोड़ा। लड़ाई के लिये बिल्कुल तैयार है। और यह है मेरा जिरहबख्तर[5] और यह रही मेरी तलवार।”

जौन के काफी मना करने के बावजूद राजा ने उसको लड़ाई की पोशाक पहनायी और उसको अपने घोड़े पर बिठा दिया। उसके बैठते ही राजा का घोड़ा तो वहाँ से भाग लिया।

जनरल को दुश्मन की सेना की तरफ जाते देख कर राजा के दूसरे सिपाही भी उत्साहपूर्वक उसके पीछे पीछे भाग लिये और कुछ ही देर में उन्होंने दुश्मनों की सेना का सफाया कर दिया।

राजा जीत गया तो सिपाहियों ने राजा की जीत की खुशियाँ मनानी शुरू कर दीं। पर जनरल का तो कहीं पता ही नहीं था। वह कहाँ गया? ढूँढने पर उनको वह चार लीग[6] दूर मिला।

वह दुश्मनों की सेना में से हो कर तेजी से भाग गया था। फिर राजा की अपनी सेना के घुड़सवार उसे ढूँढ कर राजा के पास ले कर आये।

जौन ने राजा के सामने कृतज्ञता से सिर झुकाते हुए कहा — “अगर आप लोग मेरे साथ आते तो हम लोगों ने अब तक तीन राज्य और तीन ताज जीत लिये होते। खैर अब हमने यह लडाई तो जीत ही ली है सो अब हमें इसी से सन्तुष्ट रहना चाहिये।”

राजा आश्चर्य से बोला — “क्या? क्या तुम अभी और भी लड़ाई के लिये जाना चाहते हो? मैं तो तुम्हारे साथ अपनी बेटी की शादी करने की सोच रहा हूँ।”

पर जौन किसी के बहकावे में आने वाला नहीं था। वह अपने उस काम के लिये कुछ भी स्वीकार नहीं करना चाह रहा था। वह राजा का सब कुछ छोड़ कर अपने रास्ते चल दिया।

काफी दूर जाने के बाद वह अमेज़नों[7] के राज्य में आ गया। जैसा कि सब जानते हैं कि अमेज़न की स्त्रियाँ बहुत अच्छी लड़ने वाली होती हैं। उनका अपना राज्य है जिसको एक रानी चलाती है।

उनके राज्य में किसी आदमी को रहने की इजाज़त नहीं है। अगर कोई आदमी उनको अपने राज्य में दिखायी दे जाता है तो वे उसके टुकड़े टुकड़े कर डालती हैं और उनको कुत्तों को खिला देती हैं और उसकी खाल के ढोल बना लेती हैं।

अमेज़न राज्य की रानी एक बहुत ही बेरहम स्त्री थी। वह अपनी पूरी ज़िन्दगी में हँसना तो दूर कभी मुस्कुरायी भी नहीं थी। और जौन बालैन्टो अब ऐसी ही स्त्रियों के बीच में था।

जैसे ही उन्होंने उसको देखा तो उन सबने मिल कर उसको पकड़ लिया और जंजीरों से बाँध कर घसीटते हुए रानी के सामने ले गयीं। अमेज़न के दरबार में बहुत सारे घोड़े थे सो उसका दरबार मक्खियों से भरा हुआ था।

वे सब घोड़े अपनी अपनी पूँछें हिला कर अपनी मक्खियाँ भगा रहे थे और वहाँ बैठीं अमेज़न स्त्रियाँ पंखा झल झल कर अपनी मक्खियाँ उड़ा रही थीं। पर जौन जो जंजीरों से बँधा हुआ था हिल भी नहीं सकता था और उसके ऊपर बहुत सारी मक्खियाँ बैठी हुई थीं।

रानी बोली — “बस अब तुम अपने आपको मरा हुआ ही समझो क्योंकि हमारा यही कानून है कि जो भी आदमी हमारे राज्य में आ जाता है हम उसे मार देते हैं। तुम हमारे राज्य में घुसे ही क्यों?”

जौन ने मुँह लटकाते हुए अपने आपसे कहा “ओ मेरे जूते में छेद करने वाले सूए, ओ मेरे धागे, ओ मेरी बैन्च, अगर मैं तुम्हारे साथ ही रहता तो आज मेरी यह हालत न होती।”

रानी ने अपनी बात जारी रखते हुए आगे कहा — “और सुनो, मुझे एक गरीब आदमी को मारना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। वह मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं किसी कुत्ते को मार रही हूँ। तुम मुझे सच सच बता दो कि तुम कौन हो तो मैं तुम्हारी जिन्दगी बख्श दूँगी। क्या तुमने वाकई 1000 मारे और 500 घायल किये?”

जौन तुरन्त ही बोला — “एक ही झटके में, योर मैजेस्टी।”

“यह तुमने कैसे किया?”

“आप मेरी जंजीरें खोल दें तो मैं आपको दिखा दूँ।”

रानी ने हुकुम दिया कि उसकी जंजीरें खोल दी जायें। रानी के हुकुम का पालन किया गया। उसकी जंजीरें खोल दी गयीं। उसके चारों तरफ जो घुड़सवार स्त्रियाँ खड़ी थी वे सब उसकी तरफ देखने लगीं।

दरबार में बिल्कुल शान्ति थी। एक भी आवाज सुनायी नहीं दे रही थी सिवाय घोड़ों की पूँछों के हिलने की, पंखा झलने की और मक्खियों के उड़ने की आवाज के।

जौन ने कहा — “पहले मैने कैसे किया था। ऐसे।” कह कर उसने अपने हाथ की मुठ्ठी बाँधी और उसको अपने चारों तरफ भिनभिनाती मक्खियों के बीच में घुमा दिया और उन सब मक्खियों को मार दिया।

फिर वह बोला — “अब इनको गिनो।”

“ओह तो वे मक्खियाँ थीं। ओह मेरे भगवान।” कह कर घोड़ों पर बैठी सारी अमेज़न स्त्रियाँ बहुत ज़ोर से हँस पड़ीं। हँसते हँसते उनके शरीर में बल पड़ गये। पर सबसे ज़्यादा ज़ोर से जो हँसी वह थी वहाँ की रानी।

“हा हा हा हा। मैं तो अपनी ज़िन्दगी भर में कभी इतना नहीं हँसी जितना मैं अभी हँसी। जौन बालैन्टो, तुम मेरी सारी ज़िन्दगी में वह पहले आदमी हो जिसने मुझे हँसाया है। और तुम्हारी इस मक्खियाँ मारने की तरकीब से तो तुम मेरे राज्य में भगवान के भेजे हुए दूत हो। अब तुम यहीं रहो और मेरे पति बन जाओ।”

सो उस जौन बालैन्टो की शादी अमेज़न की रानी से हो गयी और वह चमार अमेज़न राज्य का राजा बन गया। बहुत दिनों तक उन दोनों की शादी की खुशियाँ मनायी जाती रहीं।

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[1] John Balento (Story No 199) – a folktale from Italy from its Corsica area.

Adapted from the book “Italian Folktales”, by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[2] Noodles is an Italian dish. Noodles are like Indian Semiyaan, come in many lengths, but lot longer than Semiyaan. See its picture above.

[3] Translated for the word “Giants”

[4] Chestnut is a kind of nut whose fruit and the tree is shown in the picture above.

[5] Translated for the word “Armor”. Ir is normally worn in war anf figting to save loneself from other’s weapons’ wounds.

[6] League is an obsolete unit to measure length. It is approximately an hour’s walk. Its measurement was different in different countries. Now it is not used anywhere in the world.

[7] Amazon

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,87,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1882,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–9 : 14 जौन बालेन्टो // सुषमा गुप्ता
देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–9 : 14 जौन बालेन्टो // सुषमा गुप्ता
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रचनाकार
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