देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–9 : 7 फ्रा इगनैज़ियो // सुषमा गुप्ता

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7 फ्रा इगनैज़ियो[1]

फ्रा इगनैज़ियो[2] रोज मौनेस्टरी[3] के लिये भीख माँगने जाया करता था। वह साधारणतया वहाँ जाता था जहाँ गरीब लोग होते थे क्योंकि वे जो कुछ भी देते थे बहुत खुश हो कर देते थे।

पर एक आदमी था जिसके पास वह कभी नहीं जाता था वह था वहाँ का एक नोटरी[4]। उसका नाम था फ्रैन्चीनो[5]। वह बहुत ही कंजूस था और गरीबों का खून चूसने वाला था।

एक दिन फ्रा इगनैज़ियो ने उस नोटरी को नाराज कर दिया क्योंकि वह उसको छोड़ कर हमेशा ही दूसरे लोगों के घर चला जाया करता था। नोटरी इस बात से नाराज हो गया था तो एक दिन वह मौनेस्टरी में उसके इस बुरे व्यवहार की शिकायत करने गया।

उसने फादर से कहा — “फादर, क्या मैं आपको ऐसा लगता हूँ कि मैं किसी से ऐसा व्यवहार कर सकता हूँ कि मैं किसी को भीख भी न दे सकूँ?”

प्रायर[6] बोला — “तुम चिन्ता न करो मैं फ्रा इगनैज़ियो से बात करूँगा और उसको समझा दूँगा।” यह सुन कर नोटरी चला गया।

जब फ्रा इगनैज़ियो मौनेस्टरी में वापस आया तो प्रायर ने उससे पूछा — “तुम्हारा क्या मतलब है नोटरी को छोटा समझने का? कल तुम उसके घर जाओ और वह जो कुछ भी तुमको दे वह सब उससे प्रेम से ले कर आओ।”

फ्रा इगनैज़ियो ने चुपचाप सिर झुकाया और वहाँ से चला गया। अगली सुबह फ्रा इगनैज़ियो नोटरी के घर गया तो नोटरी ने उसका थैला हर अच्छी चीज़ से भर दिया। फ्रा इगनैज़ियो ने वह थैला अपनी पीठ पर लादा और मौनेस्टरी की तरफ चल दिया।

जैसे ही नोटरी के घर के बाहर उसने पहला कदम रखा उस थैले में से एक बूँद खून गिरा, फिर दूसरी बूँद गिरी, फिर तीसरी बूँद गिरी।

उसके पीछे जो लोग आ रहे थे उन्होंने उस थैले में से खून गिरता देखा तो बोले — “आज तो फ्रा इगनैज़ियो के लिये माँस का दिन है। आज फादर लोग बदलाव के लिये बहुत बढ़िया दावत खायेंगे।”

फ्रा इगनैज़ियो बिना एक शब्द बोले अपने रास्ते पर चलता रहा और अपने पीछे खून की बूँदों की लकीर छोड़ता रहा।

जब वह मौनेस्टरी पहुँचा तो ब्रदर लोगों ने देखा कि वह तो खून बिखेरता चला आ रहा है तो वे उससे बोले — “ओह, आज तो फ्रा इगनैज़ियो हमारे लिये माँस ले कर आ रहा है, और वह भी ताजा कटा हुआ।”

फ्रा इगनैज़ियो के अन्दर आने पर उन्होंने उसका थैला खोला पर उसमें तो कोई माँस नहीं था तो उनके मुँह से निकला — “अरे तो फिर यह खून कहाँ से आया?”

फ्रा इगनैज़ियो बोला — “डरो नहीं। यह खून तो थैले में से बह रहा है क्योंकि फ्रैन्चीनो ने जो भीख मुझे दी है वह उसकी अपनी कमाई की नहीं है बल्कि वह तो गरीबों को लूटा हुआ सामान है जो उनके खून पसीने की कमाई थी।

सो यह खून किसी कटे हुए ताजा माँस का नहीं है बल्कि उन गरीबों का है जिनकी कमाई उस फ्रैन्चीनो ने छीनी है।”

उस दिन के बाद फादर ने फिर कभी फ्रा इगनैज़ियो को नोटरी के घर भीख माँगने के लिये नहीं भेजा।


[1] Fra Ignazio (Story No 191) – a folktale from Italy from its Campidano area.

Adapted from the book : “Italian Folktales:”, by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[2] Fra is the short form for Friar – Friar is a religious order in Roman Catholic Church especially in mendicant orders. And Ignazio is his name.

[3] A monastery is the building or complex of buildings comprising the domestic quarters and workplace(s) of monastics, whether monks or nuns, and whether living in communities or alone (hermits). The monastery generally includes a place reserved for prayer which may be a chapel, church or temple, and may also serve as an oratory.

[4] A notary public of the common law is a public officer constituted by law to serve the public in non-contentious matters usually concerned with estates, deeds, powers-of-attorney, and foreign and international business.

[5] Francino – name of the Notary

[6] Prior – a prior (or prioress for nuns) is a monastic superior, usually lower in rank than an abbot or abbess.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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