हिंदी साहित्य के विलक्षण कवि - "कवि रघुवीर सहाय" संदर्भ :- 9 दिसंबर जन्म दिवस // राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"

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दूसरा सप्तक के कवियों में प्रमुख नाम रघुवीर सहाय का आता है। हिंदी के विलक्षण कवि,लेखक,पत्रकार,संपादक,अनुवादक,कथाकार,आलोचक। रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसंबर1929 को लखनऊ उत्तर प्रदेश में हुआ था। इन्होंने 1951 में अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर किया। 1946 से साहित्य सृजन करना प्रारंभ किया। इनका विवाह 1955 में विमलेश्वरी सहाय से हुआ।

इनकी प्रमुख कृतियाँ 'सीढ़ियों पर धूप में','आत्म हत्या के विरुद्ध','हँसो हँसो जल्दी हँसो','लोग भूल गए हैं','कुछ पते कुछ चिट्ठियां','एक समय था' जैसे कुल छह काव्य संग्रह लिखे। 'रास्ता इधर से है'(कहानी संग्रह),'दिल्ली मेरा परदेश' और 'लिखने का कारण' (निबन्ध संग्रह) उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।

रघुवीर सहाय हिंदी के साहित्यकार के साथ साथ एक अच्छे पत्रकार थे,उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत लखनऊ से प्रकाशित दैनिक नवजीवन में 1949 से की। 1951 के आरंभ तक उप संपादक और सांस्कृतिक संवाददाता रहे,उसके बाद 1951-1952 तक दिल्ली में "प्रतीक" के सहायक संपादक रहे। 1953-1957 तक आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक रहे।

रघुवीर सहाय की 'बारह हंगरी कहानियां' राख और हीरे शीर्षक से हिंदी भाषान्तर भी समय समय और प्रकाशित हुए। उनकी कविताओं के भाषा और शिल्प में पत्रकारिता का तेवर दृष्टिगत होता है। तीस वर्षों तक हिंदी साहित्य में अपनी कविताओं के लिए रघुवीर सहाय शीर्ष पर रहे। समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण स्तम्भ रघुवीर सहाय ने अपनी कविताओं में 1960 के बाद की हमारी देश की तस्वीर को समग्रता से प्रस्तुत करने का काम किया। उनकी कविताओं में नए मानवीय सम्बन्धों की खोज देखी जा सकती है। वे चाहते थे कि समाज में अन्याय और गुलामी न हो तथा ऐसी जनतांत्रिक व्यवस्था निर्मित हो जिसमें शोषण,अन्याय,हत्या,आत्महत्या,विषमता,दास्तां, राजनीतिक संप्रभुता, जाति धर्म में बंटे समाज के लिए कोई जगह न हो।

वे चाहते थे कि आजादी की लड़ाई जिन आशाओं और सपनों से लड़ीं गयी है उन्हें साकार करने में यदि बाधाएं आती है तो उनका विरोध करना चाहिए। उन्होंने उनकी रचनाओं का विरोध भी किया।

                 1984 में रघुवीर सहाय को कविता संग्रह (लोग भूल गए है) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी का कविताओं में आम आदमी को हांशिये पर धकेलने की व्यथा साफ दिखाई देती है। उनकी कविता की कुछ पंक्तियां देखिये:-

      *जितनी बूंदे

उतने जो के दाने होंगे

इस आशा में चुपचाप गांव यह भीग रहा है

1982-1990 तक इन्होंने स्वतन्त्र लेखन किया। 'वे तमाम संघर्ष जो मैंने नहीं किये अपना हिसाब मांगने चले आते हैं' ऐसी पंक्तियां रचने वाले रघुवीर सहाय जन मानस में एक दीर्घजीवी कवि थे जिनकी कवितायें स्वतन्त्र भारत के निम्न मध्यम वर्गीय लोगों की पीड़ा को दर्शाती है। नई कविता के दौर में रघुवीर सहाय का नाम एक बड़े कद के कवि के रूप में स्थापित हुआ था। 1953 में रघुवीर सहाय एक छोटी सी कविता लिखते हैं-

   *वही आदर्श मौसम

और मन में कुछ टूटता सा

अनुभव से जानता हूं कि यह बसन्त है*

रघुवीर सहाय की अधिकांश कवितायें विचारात्मक और गद्यात्मक है। वे कहते थे 'कविता तभी होती है जब विषय से दूर यथार्थ के निकट होती है'। रघुवीर सहाय भाषा सृजक रहे हैं। उनकी भाषा बोल चाल की भाषा है। आदमी की भाषा में छिपे आवेश को बनाने का प्रयास रघुवीर सहाय करते थे।

भारत में आदमी की समस्याओं और विरोधी व्यवस्था में राजनीति तथा जीवन के परस्पर सम्बन्ध को बचाये रखने का प्रयास उनकी कविताओं में दिखाई देता है।

   -98,पुरोहित कुटी,श्रीराम कॉलोनी,भवानीमंडी, पिन326502,जिला-झालावाड़

राजस्थान

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