गर्भ की उतरन व अन्य कविताएँ : पुष्पिता अवस्थी

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अंतरंग-आवाज

नदी को
नदी की तरह सुनो
सुनाई देगी-नदी
अपनी अंतरंग आवाज की तरह ।

चाँद को
चाँद की तरह देखो
दिखाई देगी चाँदनी
अपनी आँख की तरह ।

धरती को
धरती की तरह अनुभव करो
महसूस होगी-पृथ्वी
अपनी तृप्ति की तरह ।

प्रकृति को
प्रकृति की तरह स्पर्श करो
तुममें अवतरित होगी
आह्लाद की तरह ।

इकली गर्भस्थ स्त्री
सकेल लेना चाहती है- अपनी साँसें
गर्भस्थ शिशु के प्राण निमित्त

वियोग-संतप्ती अपनी माँ की साँसों से
खींच रहा है-साँस
प्रणयी शिशु
देह- भीतर
अपनी माँ की तरह

सैनिक पिता की अनुपस्थिति की अनुभूति ही
' रक्त-पहचान ' गर्भस्थ शिशु की

आँखों का अँधेरा
आँसू में
घोल रहा है-
इतिहास की काली-स्याही
माँ के एकाकीपन का तिमिर
गर्भ -कोठरी में

आकाश-गगा का नक्षत्र
प्रेम-गंगा का सितारा
अवतरित हुआ-

विरही माँ की देह में
प्रणय का शिशु
चाहत के गर्भ में
सामुद्रिक दूरियों के बीच
छटपटाता है- हृदयाकुल, मक्य सरीखा
मँडराती रहती हैं - आकांक्षाएँ तितलियों - सी
हृदय के रिक्त वक्ष-मध्य
अकेली माँ और शिशु के भीतर-एक साथ
खुंटियाए शुष्क पौधे
और अँखुआए कांटे-सा
धँसा रहता है- अकेलापन
माँ और गर्भस्थ शिशु- भीतर

प्रिय की साँसों के साथ
साँस लेना चाहती है-गर्भस्थ स्त्री
शिशु की साँस के लिए
अपनी ही तरह से

शिशु के पिता की आवाज को सुनकर
धड़कना चाहता है-माँ का हृदय
शिशु के लिए-
कि वह-
युद्ध के चक्रव्यूह से अधिक
जीवन के षड्यंत्र व्यूह के विरुद्ध
अपनी वाणी में सान सके
अपने माँ-पिता के प्रणय सींचे-शब्द

गर्भस्थ माँ
अपनी देह-ऊपर
चाहती है-सैनिक पिता की मातृभूमि प्रेरक
रक्षात्मक प्रिय हथेलियाँ
अपने अजन्मे शिशु के लिए

कि देह-गर्भ की माटी में स्थित
प्रणय-बीज की काया में
उभर सके
सैनिक हथेलियों के छापे
दस्तावेजी मोहर की तरह अनोखी लिपि में

' माँ ' को देखती हुई-देखेंगी
पिता की प्रणयातुर आँखें
अजन्मे शिशु के
शांत गर्भाकाश में
शुभांकित नक्षत्र की तरह

पुलकित किलक की
प्रथम सुगंध को
सूंध सकेगा-पिता
'माँ' की देह-कुसुम से

जन्म से पूर्व ' विरही माँ '
सिखा देना चाहती है- अपने शिशु को
  पिता की तरह ही मुस्कुराना
उसे देखना
और, रह-रहकर
अपना सब काम छोड्कर
चुंबन देना
जिसमें उसका ' प्रिय '
शिशु का पिता
भूलता रहा है- अपनी थकान

' माँ ' चाहती है-
शिशु के गर्भकाल में
उसका प्रिय उसके साथ रहे
प्रथम चुंबन की तरह

गर्भस्थ शिशु
मान-पहचान लें-उसे अपना पिता
माँ के बताने से पहले ही
पिता,
अपनी खो का प्रणयी प्रकाश
शिशु की मुँदी पलकों पर रखे
गर्भ के भीतर ही
प्रागय-उर्मि की अक्षय बूंद

दुनिया देखने से पूर्व ही
गर्भ के भीतर ही
अनुभव करे-
पिता की गोद
बाँहों, छाती के स्पर्श से जाने
पिता के साथ होने का आह्लाद-सुख

' माँ '
अपने प्रिय के साथ
सूर्योदय देखते हुए
जीना चाहती है -
अपने भीतर का सूर्योदय
गर्भ में उसे अपने साथ लिए हुए
कि वह कहला सके
प्रणय का सूर्य-सुत
प्रकृति-पुत्र

पिता के ओंठों से पहचाने-वह
संबंधों की कोमलता
और जाने कि-
पिता ने कितना प्यार किया है ' माँ ' को
प्रकृति की सर्वोतम सृष्टि की तरह
सम्मानित कर अंगीकार किया है-उसकी 'माँ' को

अपने जीवन का सर्वस्व सौंप
देह गर्भ - भीतर गढ़ा - उकेरा है - शिशु के रूप में अपना नाम
खजुराहों के शिल्पी की तरह-
  जो खजुराहो के मंदिरों की भित्तियों
और गर्भगृह में रचने से रह गया-
शिल्पी के द्वारा भी
शिशु-देह-रूप में

एक-दूसरे के लिए
पृथ्वी के कोमलतम प्रेम से रचित-शिशु
प्रणय का जीवित -जीवंत हृदय है

दोनों ने मिलकर
बहुत चुपचाप
विध्वंसक दुनिया से
बच-बचाकर
रचा है-एक महान प्रणय
जैसे-
सृष्टि रचने के साथ
ईश्वर ने रचा होगा- प्रथम प्रेम

पुन :
पुनर्जन्म लेगा-
शिशु के रूप में
प्रणय का विलक्षण प्रतिरूप
लघु मुस्कान की कल्पना भर से
छलक पड़ती हैं-नयन के भीतर
दुग्धामृत की धवलता
ममता से फड़क उठती है पयोधर की नसें
उसके दूध के दो दाँतों की स्मृति में
जो उगेंगे-उसके भीतर
चारों दिशाओं में तीर की तरह

विध्वंसक युद्धों के विरुद्ध

उससे पहले-शिशु की
दुग्ध दंतुरियाँ धँसेगी ।
अपने पिता की छाती में
जहाँ उसकी माँ ने बनाया था
अपने ' प्रेम का पहला घर '
गर्भस्थ शिशु से पूर्व
उसके घर के लिए

गर्भस्थ शिशु की
जीवन गति-स्पंदन, स्वप्न- आहट
और हलचली ध्वनियाँ
रचती हैं -सृष्टि से नव-शब्द
' माँ ' के उर-प्रांतर में
पिता के संबोधन के लिए

गर्भस्थ माँ
प्रतीक्षा करती है-शिशु के पिता का
चार आँखों से

अपने गर्भस्थ शिशु के हृदय और आखों को
अपने अधीर आकुल आँखों में साथ लिए हुए ।n

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गर्भ की उतरन

स्त्री,
जीवन में उठाती है-इतने दुःख
कि 'माँ' होकर भी
नहीं महसूस कर पाती है-
'माँ होने' और 'बनने' तक का सुख

स्त्री
होती है-सिर्फ कैनवास
जिस पर
धीरे-धीरे मनुष्य रच रहा है
घिनौनी दुनिया
जैसे-स्त्री भी हो कोई
पृथ्वी का हिस्सा
मनुष्य से इतर

स्त्री
झेलती है- जीवन में
इतने अपमान
कि भूल जाती है- आत्म-सम्मान

स्त्री
अपने को धोती रहती है - सदैव
अपने ही आँसुओं से

जैसे - वह हो कोई
एक मैला - कुचैला कपड़ा
किसी स्त्री - देह के गर्भ की उतरन

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स्त्री का इंद्रधनुष

घास काटते हुए
अकसर सोचती है-वह
अगर ' समय ' को भी-वह
घास की तरह काटकर सहेज सकती
तो अपने समय को सँभाल रखती अपने पास

तब लिखती वह
समय की वास्तविक सच्चाई
जिसे देखते हुए भी अनदेखा किए रहते हैं-लोग
जैसे कुछ हुआ ही न हो ।

वह
सब सच
पुख्ता ढंग से बयान करना चाहती है-
समय के अमिट शिलाखंड पर
जहाँ किसी के हाथ नहीं पहुँच पाते है- ध्वस्त करने के लिए

वह
अपने श्रम को
फसल में बदल देना चाहती है-
भूख के विरुद्ध

आतंक और युद्ध विस्फोटों की आग और धुएँ ने सोख लिए हैं

इद्रधनुष
वह, समय को नए रंग-संयोजन में गढ़ देना चाहती है
धरती पर इंद्रधनुष की तरह
जो चले आ रहे आकाशी इंद्रधनुष की धारणा से है इतर
काल्पनिक-देव इंद्र का नहीं
स्त्री द्वारा रचित-धरती पर
अपने समय के लिए... समय के पक्ष
जीवन राग की संजीवन-प्रत्यंचा

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pushpita
पुष्पिता अवस्थी
जन्म गुरगाँव, कानपुर में हुआ ।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पीएच. डी. ।
बसंत कॉलेज फॉर वीमेन ( का. हि. वि. से संबद्ध) में हिंदी की विभागाध्यक्ष रहीं ।
2००1 में सूरीनाम के राजदूतावास भारतीय सांस्कृतिक केंद्र में प्रथम सचिव व प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हुईं । 2००3 में सूरीनाम में हुए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका । इस मौके पर उन्होंने सूरीनाम के सर्जनात्मक योगदान को रेखांकित करते ' कथा सूरीनाम ', ' कविता सूरीनाम ' के संपादन के साथ ही सूरीनाम पर विनिबंध और सूरीनाम के समग्र साहित्य पर पहली बार साहित्य अकादेमी से प्रकाशित ' सूरीनाम का सृजनात्मक साहित्य ' ( 2०12) विशेष चर्चित पुस्तक रही ।
' शब्द बनकर रहती हैं ऋतुएँ ', ' अक्षत ',  ' ईश्वराशीष ', ' हृदय की हथेली ', ' रस गगन गुफा में अझर झरै ', ' अंतर्ध्वनि ', ' देववृक्ष ', ' शैल प्रतिमाओं से '  ' तुम हो मुझमें ' से उन्होंने कविता के क्षेत्र में मजबूती से कदम रखा । ' छिन्नमूल ' सूरीनाम केंद्रित भारतवंशियों के जीवन पर उपन्यास । ' गोखरू ' और ' जन्म ' कहानी- संग्रह । हिंदी, अंग्रेजी, डच व विभिन्न भाषाओं में एक दर्जन से अधिक कविता - संग्रह । ' आधुनिक काव्यालोचना के सौ वर्ष ' उनका मानक कोटि का शोधकार्य है । ' कैरिबियाई देशों में हिंदी शिक्षण ' के अलावा ' दि नागरी स्किप्ट फॉर बिगनर्स ' विदेश में हिंदी के प्रसार में सहायक महत्त्वपूर्ण पुस्तकें हैं ।
विश्व भर के भारतवंशियों व अमर इंडियन जनजातियों पर अपने अध्ययन व विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्धि । संप्रति नीदरलैंड में हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन की निदेशक। शमशेर सम्मान सहित देश- विदेश के अनेक सम्मानों से सम्मानित।

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