मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

क्या करते होंगे ? -- संजीव ठाकुर

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क्या करते होंगे

क्या करते होंगे रुपयों का
कुबेर के नाती ?
गद्दों में भरवाते होंगे?
सजाते होंगे चिता
मृतकों को जलाते होंगे
इस्तेमाल करते होंगे
टॉइलेट पेपर की तरह ?
नाक का नेटा पोछ फेंक देते होंगे ?
सेनेटेरी नैप्किन खरीदने की जहमत से
बच जाती होंगी उनकी स्त्रियाँ ?
फेंक देती होंगी डस्ट्बिन में
खून सनी गड्डियाँ ?
रगड़ती होगी आया
दस की गड्डी से
उनके घरों में बर्तन
और सहलाती होंगी
अपने कुत्ता–मूते नसीब को
मन-ही–मन ?

कितने खुश होते होंगे
कुबेर के वंशज
बाथरूम से निकलकर
रुपयों के पायदान पर
गीली स्लीपर रखकर
खड़े होते वक्त !


दौड़

वे पहुँच गए वहाँ
जहाँ उन्हें पहुँचना था
अब वे उससे आगे
पहुँचने की तैयारी में हैं ।

मेरे लिए वहाँ तक
पहुँचना 
नामुमकिन तो रहा ही
उस रास्ते का पता भी लापता रहा

मैं देखता रहा सबको
आगे –
और आगे जाते हुए
मैं कर भी क्या सकता था
इसके सिवा ?

वर्णनातीत

वर्णनातीत है व्यथा मेरी
टूट –टूट जाते हैं शब्द
कुलबुलाता है रक्त धमनियों में
चटक –चटक कर माथे की नसें
चीत्कारती हैं ।

कुछ भी तो नहीं होता
इच्छाओं के मर जाने से
सिद्ध होती है
कापालिक की कामना केवल !

बोलो ?

आखिर कब खत्म होगा
एक हाथ से
रोटी बेलने का प्रयास ?

भांथी दिए बगैर
निकला है सुर
हारमोनियम से ?

लत
नाउम्मीदी की गाज
गिरी है मेरी छत पर
अब छोड़ दूँगा
अड़ना
हर लत पर

लत ही तो है
चाहना
किसी को
इस हद तक ?


खामोशी             
खामोशी ...
हवा की मौजूदगी में ...


संजीव ठाकुर

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