सुरंगमा का हाइकु संसार // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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डा. सुरंगमा यादव एक उभरती हुई हाइकुकार हैं। उनका अभी तक कोई हाइकु संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ है, पर प्रकाशनाधीन है। उन्होंने अपनी कुछ हाइकु रचनाएं (करीब, ३००) मुझे अवलोकनार्थ भेजी हैं। उनके कुछ हाइकु मैंने “सत्रह आखर” वाट्स-एप पर भी देखे। मैं उन्हें पढ़कर पूरी तरह आश्वस्त हुआ हूँ।

मुलत: जापान की हाइकु काव्य-विधा अब भारत में पूरी तरह प्रतिष्ठित हो गई है। यह तीन पंक्तियों की ५-७-५ वर्ण-क्रम में कदाचित सबसे छोटी कविता है, जिसमें कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक बात कहने की कोशिश की जाती है। यों तो हाइकु के लिए कोई भी विषय अछूता नहीं है, लेकिन विशेषकर प्रकृति और प्रेम हाइकु काव्य के मुख्य प्रेरक रहे हैं।

डा. सुरंगमा ने हाइकु विधा की मर्यादा का पूर्ण पालन करते हुए, अपनी हाइकु कविताओं में प्रकृति के सौन्दर्य को बखूबी उभारा है। प्रकृति अनेक रूपों में प्रकट होती है। ऋतुओं के रूप में, रात्रि, प्रात, दोपहर और संध्या काल के रूप में, पेड़ पौधों, फूल, पत्तियों के रूप में, चाँद सितारों के रूप में – और भी न जाने कितने ही अन्य रूपों में ...

ग्रीष्म ऋतु के बाद जब वर्षा आती है तो जहां वह एक ओर भीषण गरमी और कड़ी धूप की तपन से छुटकारा दिलाती है, वहीं वह आंसुओं की भाँति मानो मन का मैल भी धो देती है। मानसिक से लेकर भौतिक, पूरा परिवेश ही बदल जाता है। कवियित्री कहती है –

हवा बदली / छाई जब बदली / हुई सुहानी

घन घनेरे / घन घोर गर्जन / सहमी ग्रीष्म

ग्रीष्म उत्पात / उमड़ी बरसात / दुष्ट दमन

बरसों मेघ / धुले मन मलिन / पात सरीखा

बसंत तो हमेशा से ही प्रेम का सन्देश लेकर आता है। प्रेम और वसंत को जोड़ते हुए सुरंगामा जी कहती हैं, “बसंत आया / लगी फूलों की हाट / भटका भौंरा।” इसी प्रकार हेमंत ऋतु में भी उत्कट प्रेम से व्याकुल होकर प्रतीक्षारत नायिका अपने प्रिय के स्वागत के लिए बेचैन हो उठती है –

“खंजन नैन / स्वागत को बेचैन / हेमंत पिया।”

प्रेम एक ऐसी भावना है जो प्राय: शब्दों में प्रकट नहीं हो पाती। ऐसे में उसे कभी आंसुओं में, कभी इशारों में, कभी स्वप्न में तो कभी स्मृति में संजो के रखा जाता है।

तेरे सपने / लेकर सोई-जागी / ऐसी लौ लागी

याद तुम्हारी / पावस बनकर / छाई नैनों में

मादक स्मृति / सिन्धु सरीखे नैन / डूबा सो पार

शब्द नहीं तो / कह दो संकेतों में / तुम मेरे हो

उत्कट प्रेम कभी मरता नहीं। स्मृतियों में सुरक्षित रहता है। यादों के पंछी कलरव करते रहते हैं। और यादें एक-दो नहीं होतीं। कड़ी दर कड़ी अनेकानेक स्मृतियों की लडियां बन जाती हैं।

मनन बगिया / कलरव करते / यादों के पंछी

जोडूं कड़ियां / यादों की तो बनती / लम्बी लडियां

विचर रही / मानस सागर में / याद हंसिनीं

स्मृतियों का निवास स्थान, ज़ाहिर है, व्यक्ति का मन ही होता है। मन हमारा सतरंगी यादों का इंद्र धनुष है। भूली-बिसरी, खट्टी-मीठी सभी यादें मन में ही तो रहती हैं। मन यादों का संगम है। किसी की कोई स्मृति जब मन में बस जाती है तो वह उस प्रिय पात्र से भी अधिक प्यारी हो जाती है जिसकी कि वह याद है।

याद तुम्हारी / लागे तुमसे प्यारी / आके ना जाती

इंद्र धनुष / सतरंगी यादों का / छाया मन में

भूली-बिसरी / खट्टी-मीठी यादों का / मन संगम

कवियित्री के अनुसार मनुष्य का मन केवल यादों का घर ही नहीं है, वह हमारे जीवन-नाटक का कुशल निर्देशक भी है। हमारी सारी दैहिक गतिविधियाँ उसी के इशारे पर चलती हैं। सच पूछा जाए तो वही हमारी नाव का खेवैया है। और यही मेरा मन है जो कभी वैराग्य धारण कर ले तो केवल ‘मेरा’ नहीं रहता, सबको अपना बना लेता है।

मन है ऐसा / निपुण निदेशक / देह नचाए

मन नाविक / तन नौका लेकर / फिरे घूमता

मन वैरागी / सब जग लगता / अपना जैसा

डा, सुरंगमा के हाइकु काव्य में इस प्रकार के दार्शनिक भाव भी जगह जगह बिखरे पड़े हैं। मनुष्य केवल वाह्य नेर्त्रों से ही नहीं देखता, यदि वह अन्दर झाँक कर अपने अंतर चक्षुओं से देखे तो उसे पारमार्थिक सता के अनंत रूप दिखाई दे सकते हैं। वह कहती हैं – “अंतर चक्षु / खोल निहारे मन / रूप अनंत”।

जब सबकुछ बिखर जाता है तो कभी कभी आदमी को ऐसा लगता है मानों सब समाप्त ही हो गया। लेकिन सकारात्मक सोच की वकालत करने वाली हमारी कवियित्री निराश नही होती। सुबह कभी तो आएगी। बेशक आज अन्धेरा है और यह रात जिद्दी भी हैं - “हटीला तम / छिपा दीपक तले / षड्यंत्र कारी” – लेकिन यह षड्यंत्र सफल होने वाला नहीं है। चोट खाकर और फिर संभल कर ही आदमी कुछ बन पाता है। सुरंगमा जी अपने काव्यात्मक अंदाज़ में स्पष्ट कहती हैं --

निराश नं हो / बाद रात्रि के प्रात / चलता क्रम

सूर्य अस्त / समापन नहीं ये / अल्प विराम

संभल गया / चोट सह पत्थर / बना देवता

जापान में हाइकु और सेंर्यु में अंतर किया गया है। सेंर्यु वह हांइकु है जो सामाजिक और राजनैतिक स्थितियों पर टिप्पणी करता है। ऐसे यदि हर विषय की हाइकु रचनाओं को, हाइकु न कहकर, अलग अलग नाम दे दिए जाएं, जैसे सेंर्यु, तो न जाने हाइकु-नुमा कितनी ही काव्य-विधाएं हो जाएंगीं। हिन्दी में इसलिए प्राय: उन रचनाओं को भी, जो हाइकु के अनुशासन का पालन करके राजनैतिक-सामाजिक विषयों पर टीका-टिप्पणी करती हैं, हाइकु के अंतर्गत ही ले लिया गया है। डा. सुरंगमा यादव अपने सामाजिक और राजनैतिक परिवेश के प्रति उदासीन नहीं हैं और उन्होने ऐसी अनेक हाइकु रचनाएं की हैं जो परिस्थितियों पर काव्यात्मक टिप्पणियाँ हैं। इस प्रकार नारी की दयनीय स्थिति, बाढ का प्रकोप, दूषित हो रही नदियों की चिंता, बुजुर्गों की मानसिकता, आदि विषयों पर भी उन्होंने सुन्दर हाइकु रचे हैं। उनके हाइकु संसार में कोई विषय ऐसा नहीं है जो हाइकु विधा के लिए निषिद्ध हो।

मैं डा. सुरंगमा यादव की काव्य क्षमताओं पर पूरी तरह आश्वस्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि वे अवश्य ही कुछ ही अरसे में हिन्दी साहित्य में एक बड़ी हाइकुकार होकर उभरेंगीं।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

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