व्यंग्य // कभी गरम कभी नरम // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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श्रीमती जी रोटी सेंक रही थीं। मुझे आवाज़ दी और बोलीं, खाना खाने आजाओ। गरम गरम रोटियाँ सेंक रही हूँ। “लेकिन अभी तो आठ भी नहीं बजा है। इतनी जल्दी ! एक-आध घंटा ठहर के ही खाएंगे।” बस मेरा इतना कहना था कि रोटियों की तो पता नहीं, मेम-साहिबा ज़रूर गरम हो गईं। बस तुम्हारा तो हमेशा से यही रहा है। मेरे हाथ की ताज़ी रोटी तो खाना ही नहीं चाहते। अब खाना ठंडी !! आखिरकार मुझे ही नरम पड़ना पडा।

पति-पत्नी का यह, कभी नरम और कभी गरम हो जाना पारिवारिक मिज़ाज की एक आवश्यक तासीर है। अगर नमक-मिर्च अधिक या कम न हो, तो स्वाद इसी में है। वस्तुत: नरम और गरम में कोई विरोध नहीं है। केवल विरोधाभास है। कभी लड़ते भी हैं तो मिल भी जाते हैं। किसी फिल्म का एक गाना है – किस्मत की हवा, कभी नरम, कभी गरम। क्या किया जा सकता है ?

मिज़ाज की तरह मौसम भी है। ऋतुओं में अप्रत्याशित बदलाव आया है। सर्दियों के दिन आ गए हैं। लेकिन सर्दी जैसी पड़ना चाहिए, पड़ नहीं रही है। रातें ज़रूर ठंडी हो गई हैं। नरम बिस्तर और गरम रजाई की दरकार होने लगी है। दिन में तेज़ धूप अभी भी पड़ रही है। मौसम का यह नरम गरम होना स्वास्थ्य पर भी अपना असर दिखा रहा है। बूढ़े और बच्चों का स्वास्थ्य तो वैसे भी नरम गरम रहता ही है।

नरम-गरम की उपस्थिति केवल मिज़ाज और मौसम तक ही सीमित नहीं है। हर जगह है; हर किसी में देखी जा सकती है। ईश्वर ने शायद दो तरह के लोग बनाए ही हैं। आधे गरम और आधे नरम। ठीक जिस तरह मनोविज्ञान के अनुसार लोग बहिर्मुखी और अंतर्मुखी होते हैं उसी तरह गरम और नरम भी होते हैं। लेकिन जो नरम है, वह कभी गरम नहीं हो सकता, ऐसा नहीं है। बस, गरम व्यक्तित्व जल्दी गरम हो जाता है, और नरम व्यक्तित्व अधिकतर नरम बना रहता है। गरम-नरम तत्व होता तो सभी में है। ईश्वर की माया है !

अर्थशास्त्र और राजनीति में भी यह गरम-नरम उपस्थिति दर्ज होती रहती है। उपभोग करने वाली वस्तुओं में प्राय: गरमी और नरमी बनी ही रहती है। कभी आलू के दाम बढ़ते हैं और वह गरमा जाता है तो कभी टमाटर नरम हो जाता है। बाज़ार कभी नरम है तो कभी गरम है। लेकिन यदि बाज़ार इतना नरम हो जाए की उठ ही न पाए, तो समझिए कि अब आर्थिक संकट आ गया है। जब हम स्वतन्त्र हुए थे तब कहते हैं, डालर और रुपए की कीमत बराबर थी। लेकिन आज रुपया इतना नरम हो गया है कि एक डालर के चौंसठ-प्लस रूपए मिल जाते हैं। पर भारत अभी आर्थिक संकट से मुक्त है। आर्थिक संकट झेलने की कहते हैं भारत में अपार क्षमता है। उसके पास हर कठिनाई झेलने का कोई न कोई ‘जुगाड़’ जो है !

भारत की राजनीति के इतिहास में कांग्रेस के अन्दर गरम दल और नरम दल बड़े प्रसिद्ध रहे हैं। गरम दल में जहां लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चन्द्र पाल (लाल, बाल, पाल के नाम से प्रसिद्ध) आदि, नेतागण थे, वहीं नरम दल का नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले, फ़िरोज़ शाह मेहता और नारोजी जैसे दिग्गज कर रहे थे। गरम दल भारत की पूर्ण आज़ादी की मांग का समर्थक था जबकि नरम दल, आज़ादी की पृष्ठभूमि के तौर पर, ब्रिटिश शासन के अन्दर ही ‘स्वराज’ चाहता था। नरम और गरम दल के दलदल में बेचारे दो राष्ट्र-गीत तक फँस गए। “वन्दे मातरम” और “जन गण मन” एक दूसरे को चिढाते रहे। दोनों दलों ने एक एक गीत अपना लिया था। मज़े की बात तो यह है कि इन दोनों गीतों का द्वैत आज भी बहुत-कुछ कायम है !

क्या किसी धर्म के भी गरम और नरम समर्थक हो सकते हैं ? क्यों नहीं ? इधर राजनैतिक गलियारों में हिन्दू धर्म की तो नहीं, “हिंदुत्व” की बड़ी चर्चा है। “हिंदुत्व” राज कर रहा है। इस हिंदुत्व राज का कैसे मुकाबला किया जाए, अभी तक समझ में नहीं आ रहा था। अब रास्ता निकलता दिखाई देने लगा है। जो हिंदुत्व राज कर रहा है उसके बारे में कहा गया है कि यह गरम हिंदुत्व है। नरम हिंदुत्व से यह अलग है। विभाजन कुछ इस प्रकार किया गया है। गरम हिंदुत्व भारत में रहने वाले सभी भारतवासियों को “हिन्दू’ कहता है जब कि नरम हिंदुत्व सबको हिन्दुस्तानी कहता है। गरम हिंदुत्व को हिन्दुओं के अतिरिक्त अन्य सभी धर्मावलम्बी नापसंद हैं, नरम हिंदुत्व उनके साथ सहयोग-पूर्वक रहना चाहता है। एक शब्द में कहें गरम हिंदुत्व कट्टर है, नरम हिंदुत्व उदार है। गरम और नरम हिंदुत्व के इस विभाजन ने राज करने वाले हिंदुत्व को सोचने के लिए विवश कर दिया है। क्या वह इस नरम हिंदुत्व की अब अनदेखी कर सकेगा ?

आज गांधी जी होते तो बड़े पसोपेश में पड़ जाते। उनके समय में गरम-हिंदुत्व और नरम-हिंदुत्व का भेद था ही नहीं। तब केवल हिन्दू थे और हिन्दू धर्म था। हिन्दू-धर्म और हिंदुत्व का भी भेद नहीं था। गांधी जी स्वयं हिन्दू थे और हिन्दू होने का गर्व भी उन्हें था। कई लालच उनके सामने आए लेकिन वे हिन्दू धर्म को छोड़ने के लिए कभी तैयार नहीं हुए। पर वे दूसरों से भी कहते थे कि वे अपना अपना धर्म कभी न छोड़ें। आखिर हर धर्म की अपनी अपनी अच्छाइयां और अपनी अपनी सीमाएं होती हैं।

हिन्दू धर्म की ऐसी की तैसी। आज ज़माना गरम हिंदुत्व और नरम हिंदुत्व का आ गया है। आप कौन से हिदुत्व को “बिलोंग’ करते हैं ? हंसो, हंसो – जल्दी हंसो।

--डा, सुरेन्द्र वर्मा (मो.- ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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1 टिप्पणी "व्यंग्य // कभी गरम कभी नरम // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. पसंद आया आपका गर्म व्यंग्य नर्म बातों पर। इस माया में सरगर्मी का असर है पर काफी हद तक नर्म है! बधाई।

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