सूरज कुमार मिश्र की कविताएँ

-----------

-----------

image

1. "मुझको लड़ना आता है"

मुझे असफलताओं ने मारा है
वक़्त ने बहुत लताड़ा है
सहा है हर एक जख्म मगर
ये दिल ना अब तक हारा है
गिरा हज़ारों बार हूँ पर
मुझे उठकर चलना आता है
मैं एक दिन मंजिल को पा लूँगा
मुझको लड़ना आता है

है सिर में मेरे सनक बसी
एक पागलपन है सीने में
जो लड़ा नहीँ वो क्या जाने
क्या मजा है लड़ के जीने में
मुझे तूफ़ानी लहरों में भी
पतवार चलाना आता है
मैं एक दिन मंजिल को पा लूंगा
मुझको लड़ना आता है

©सूरज कुमार मिश्र

2. "हार मानना है मृत्यु"

श्वास जब तलक है मुझमें हार मानुंगा नहीँ
कि हार मानना है मृत्यु, मृत्यु हार है नहीं

हैं राह में बिछे ये शूल आंधियां भड़क रहीं
ऐ आसमां दहाड़ता है बिजलियां तड़क रहीं
तो क्या हुआ जो है नहीं कोई भी मेरे साथ में
हुं जानता मैं चलना भी अकेले काली रात में

कुचल-कुचल के शूल को कदम ये आगे बढ़ रहे
लहू-लुहां से हौसले हैं मुश्किलों से लड़ रहे
जो शक्ति रोक ले मुझे वो आंधियों में है नहीं
कि हार मानना है मृत्यु, मृत्यु हार है नहीं

जरा से डगमगा गये हैं पांव मेरे राह पर
तो फिर से गिर पड़ा हूं मैं ये है जरा कठिन डगर
गिरा हूं मैं मरा नहीं मैं हूँ अभी तड़प रहा
है दिल मेरा थका नहीं ये दिल अभी धड़क रहा

रहा उमड़ नसों में रक्त उठ के मैं खड़ा हुआ
लगा हूं चलने फिर से लड़ने जिद पे मैं अड़ा हुआ
जो प्राण मांगती विजय तो प्राण त्याग दूँ वहीं
कि हार मानना है मृत्यु, मृत्यु हार है नहीं

©सूरज कुमार मिश्र

3. "अजनबी हमसफर"

कल तलक शख्स मुझसे जो था अज़नबी
राह में यूं मिला हमसफर बन गया
वो मेरे साथ कुछ दूर तक ही चला
पर जरा सा सफर वो जफ़र बन गया

ओस की बूंद सा हूं गुलाबों पे मैं
धूप बनकर वो देता  मुझे राहतें
बिन मेरे उसकी सांसे भी कामिल नहीं
थी खबर उसको वो बेखबर बन गया

रूह तेरी मेरी रूह में बस गयी
और इबादत बनी हैं मेरी चाहतें
जान लेकर रहेगा मेरी इश्क़ ये
है पुराना तो शायद जहर बन गया

©सूरज कुमार मिश्र

4. "तुम्हारा वो  पेन"

तुम्हारा वो पेन
जो तुम उस दिन एग्जाम के बाद अपनी मेज़ पर छोड़ कर चली गयी थी
मैंने आज तक संभाल कर रखा है
उस पेन में स्याही नहीं है
फिर भी अक्सर मैं उससे लिखा करता हूं
कुछ यादें कुछ बातें
जो आंखे पढ़ नहीं पाती
पर दिल समझता है
क्योंकि इस पेन को हासिल है
तुम्हारी उंगलियों का प्यार
और तुम्हारी लाली की महक
वो प्यार जो आज भी मुझे एहसास कराता है
तुम्हारे पास होने का
वो खुशबू, जिससे आज भी महक उठती हैं
मेरी सांसे
और ये सब शायद उस स्याही की तरह
कभी खत्म नही होगा...

©सूरज कुमार मिश्र

5. होकर खफा मुझसे रह सकते हो


तो रह लो
हमसे नज़रें मिलाकर बेवफा हमें कह सकते हो
तो कह लो
हटाकर देख लो तस्वीर मेरी तकिये के नीचे से
फिर ख्वाबों की बहारों में बह सकते हो
तो बह लो

©सूरज कुमार मिश्र

6.


तुम्हारी हँसती सी आँखें कहीँ खँजर न हो जायें
तेरा चेहरा मेरे दिल का हंसी मन्ज़र न हो जायें
मेरी आँखों में तुमने ख्वाबों के जो बीज बोये हैं
उन्हें मेरी सींचती आँखें कहीँ बन्जर न हो जायें

©सूरज कुमार मिश्र

7.


तेरी आँखों की मस्ती में समन्दर डूब जाते हैं
तेरी चाहत में मौसम भी तराने खूब गाते है
चाँदनी रात में जुल्फें बिखेरे छत पे आती हो
और हँसती हो धीरे से तो तारे टूट जाते हैं

©सूरज कुमार मिश्र

8.    "साइबर कैफे"

एक शाम मैं साइबर कैफे गया..किसी काम के सिलसिले में
मेरा पूरा ध्यान अपने कंप्यूटर पर था
तब तक कोई आकर मेरे पड़ोस वाली चेयर पर बैठ गया
मुझे धीमी सी खुशबू आयी और मैंने धीरे से मुड़कर देखा
उसका आधा चेहरा ही दिखा मुझे
पंखे की हवा की वजह से उसकी जुल्फें बिखर कर उसके होठों से उलझ गयी थी
उसने सम्भाला उन्हें..और अचानक उसकी नज़र मुझ से मिल गयी
मैं झिझक कर अपनी कंप्यूटर स्क्रीन को देखने लगा
उस वक्त मेरी धड़कन की स्पीड तो इंटरनेट की स्पीड से भी ज्यादा थी
और मेरी उँगलियाँ की बोर्ड पर काँप रहीं थी
तभी एक छींक आ गयी उसे
मानो किसी सुंदर नाजुक फूल को एक हवा का झोंका हिलाकर चला गया हो
और उसने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा..सॉरी !
और मुझे लगा बस अब मैं गया
तब तक पीछे से छोटू बोला भइया..आपका एक घंटा पूरा हो गया....

©सूरज कुमार मिश्र

9."मेरी चाय"

मेरे दिन की शुरुआत ही तुझसे होती है
और मैं अपनी शाम भी
जीता हूँ तेरे ही साथ
तू शामिल होती है मेरी हर एक खुशी में
और गमों में भी देती है मेरा साथ
फिर भी लोग कहते हैं कि
तू मेरी बुरी आदत है
ओ मेरी चाय
मैं कैसे छोड़ दूँ तुझे
तू तो प्यार है मेरा
और हाँ..अब कोई और भी मिला है
बिल्कुल तुझ जैसा...
और अब उसकी भी आदत है मुझे

©सूरज कुमार मिश्र

10."मुकम्मल साथ तेरा हुआ"

जब से मिली तुझसे नज़र
इस दिल पे हुआ ये असर
हर जगह नज़र आये तू
रही मुझको ना अपनी ख़बर

मुकम्मल साथ तेरा हुआ
खुदा ने पूरी की हर दुआ
दीवानों सा हूँ रहने लगा
ज़रा सा इश्क मुझको हुआ

मुकम्मल साथ तेरा हुआ...

तू है मेरे हर एक ख्वाब में
शबनम से सजे गुलाब में
मेरी हर खुशी हर ग़म में  भी
है शुमार तू.......

तेरी आँखों में हँसती एक फिजा
मुझे करती है बेबस सदा
जो उतरे ना कभी मेरी आँखो से
वो खुमार तू......

जब से मिली तुझसे नज़र
इस दिल पे हुआ ये असर
हर जगह नज़र आये तू
रही मुझको ना अपनी ख़बर

ये मौसम सर्द सा जब हुआ
तेरी सांसो ने मुझको छुआ
दीवानों सा हूँ रहने लगा
ज़रा सा इश्क मुझको हुआ

तेरी लिये रहता हूँ बेकरार सा
तेरा खफा  होना लगे प्यार सा
मेरी साँसें चले जिस वज़ह से
वो मर्ज तू.....

हर पल मुझे तेरा एहसास है
तू दूर रहके भी पास है
जो अश्क भरी आँखों में हो
वो दर्द तू....

जब से मिली तुझसे नज़र
इस दिल पे हुआ ये असर
हर जगह नज़र आये तू
रही मुझको ना अपनी ख़बर

मुकम्मल साथ तेरा हुआ
खुदा ने पूरी की हर दुआ
दीवानों सा हूँ रहने लगा
ज़रा सा इश्क मुझको हुआ...


©सूरज कुमार मिश्र

-----------

-----------

0 टिप्पणी "सूरज कुमार मिश्र की कविताएँ"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.