शनिवार, 2 दिसंबर 2017

कहानी // पुनर्जन्म // प्रतिभा

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पुनर्जन्म

मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ .... ये सन्नाटा कभी गहरी धुंध बनकर मुझे घेर लेता है और मैं आँखें फाड़ - फाड़कर देखने की कोशिश करने पर भी कुछ देख नहीं पाती हूं ...कभी कीचड़ की तरह छितर कर मेरे पैरों से लिबड़ जाता है और मेरे लिए एक कदम भी चलना मुश्किल... कभी अंधेरी गुफ़ा बनकर मुझे लीलने के लिए मुँह फाड़े धीरे धीरे आगे बढ़ता नज़र आने लगता है और मैं घबराकर आँखें बंद कर लेती हूँ ....और कभी ये मुझे उड़ाकर ले जाता है और सृष्टि के अन्तिम छोर पर ले जाकर खड़ा कर देता है जहाँ कोई नहीं होता , न कोई इंसान न कोई जानवर ....।

मैं एकाएक सोचने लगती हूँ ये सन्नाटा भीतर है या बाहर ... या दोनों जगह ... फिर लगता है नहीं भीतर नहीं है शायद बाहर ही है ....भीतर कैसे हो सकता है ...? भीतर तो शोर है , भीषण शोर ... उस कमरे का गूँजता शोर, जिसमें तुम्हारी लाश पंखे से लटकी मिली ... तुम्हारी खुली आँखों से बहती शोर की नदी उसी समय मेरे भीतर प्रवेश कर गई थी ... तुम्हें घर में अकेला पाकर उन्होंने तुम्हें मारकर पंखे से लटका दिया और झूठा प्रचार किया कि तुमने आत्महत्या की है ... पर मैं जानती हूं तुम आत्महत्या नहीं कर सकते .... पंखे से लटके-लटके तुम्हारी लाश ने तुम्हारे शब्दों को एक शोर में तब्दील कर दिया था ... वो शोर उस कमरे से निकलकर पूरे गाँव में फैल गया है .... वो किसानों के जुलूसों में , स्वयंसेवी संस्थाओं के आन्दोलन में , मीडिया की कवरेज में , पत्रकारों की रिपोर्टों में , एक मज़बूत आवाज़ की शक्ल अख्तियार करता जा रहा है ।

सब ओर आवाज़ें ही आवाज़ें हैं ... स्थगित कर दिए गए जीवन की आवाज़ ... खण्डित होते विश्वास की आवाज़ ... काँच की किरचों की तरह बिखरे भविष्य की आवाज़ ... आहत होते सत्य की आवाज़ .... स्वाह होते हवन की आवाज़ और ये सारी आवाज़ें अपने आप में सवाल भी हैं और जवाब भी ।

मैं बालकनी से कमरे में आ जाती हूँ ... पीछे - पीछे तुम भी आ जाते हो ... तुम्हारे चेहरे पर अंकित चिन्ता की रेखाएँ तुम्हारे हंसमुख चेहरे से मेल नहीं खा रही थीं , अटपटी सी लग रही थीं , बहुत मुश्किल से तुम कह पा रहे थे , ''किसी गरीब की ज़मीन हड़प कर कोई अमीर क्यों बनना चाहता है , हिम्मत है तो मेहनत करके अमीर बनें , कौन रोकता है ?''तुम्हारे हर शब्द से प्रवाहित होती तुम्हारी सच्चाई तुम्हारे पूरे व्यक्तित्व को महीन, चमकीले और शक्तिशाली आशीर्वादों से आच्छादित करती जा रही थी ।

मैं तुम्हारे चेहरे पर आते जाते आक्रोश के बादलों को तुम्हारी आँखों से दिल तक की यात्रा करते देखती रही और तुम्हारी तकलीफ़ को महसूसती रही।

मैं चाहती थी तुम्हें कहूँ एक ब्रेक ले लो ... चलो , पहाड़ों पर चले चलें ... इन सब समस्याओं , चिन्ताओं से दूर ... तुम्हें देवदार बहुत पसन्द हैं न .... नहीं तो कोणार्क देख आते हैं ... उसमें भी तो तुम सब भूल जाते हो ... अब लग रहा है तुम्हें ले ही जाती ... कुदरत तुम्हें अपनी बाहों में छिपा लेती और ये दुष्ट तुम्हें ढूँढ ही नहीं पाते ।

पल भर में तुम आँखें बंद कर लम्बी साँसें भरते दिखे ... अपनी श्वास से तनाव को नियंत्रित करते ... डीप ब्रीदिंग ऐसे में हमेशा तुम्हारा हथियार रहा है.... अपने ही भीतर अपने शक्ति स्रोतों के आगे एकाएक उभर आए व्यवधानों के पहाड़ हमेशा से तुम इसी तरह हटाते रहे हो ... और फिर ऊर्जा संचित कर उठ खड़े होते रहे हो । मैं हमेशा की तरह मोहित होकर बस तुम्हें देखती भर २हती हूं .... लगातार , लगातार , लगातार । लेकिन इस बार तुम्हारी सिटिंग बड़ी लम्बी थी ... शायद तनाव का विस्तार ज़्यादा था या तुम्हें तैयारी ज़्यादा करनी थी ।

आँखें खोलने के बाद भी तुम संयत नहीं हो पाए थे .... असंयत भाव से ही बोले थे तुम , '' कहते हैं हम जो कर रहे हैं करने दो , गरीबों की भूमि हड़पने दो , कर चोरी करने दो नहीं तो जान से हाथ धो बैठोगे ... चाहते हैं मैं पूर्व अधिकारियों की तरह उनकी मदद करूँ वरना हटा दिया जाऊँगा ... कितनी बार तबादला करवाएँगे ...?''

मैं तुम्हारे चेहरे पर उभरते विरोध की गरम हवा की तपिश को महसूस कर रही थी... डर का एक छोटा सा अंकुर मेरे भीतर फूटा था पर मैंने तुम्हें कुछ नहीं कहा था । मैं हमेशा तुम्हें भ्रष्टाचार के बॉर्डर पर तैनात जवान के रूप में ही देखती आई हूँ ... कई बार डरती भी हूँ फिर एकाएक अपने आप को एक सैनिक की पत्नी के रूप में देखकर डर को लपेट कर एक कोने में रख देती हूँ... हमेशा से चाहती रही हूँ अपने भीतर का सारा बल तुम में उड़ेलती रहूँ ।

बस एक ही बात परेशान करती है मुझे ... बचपन से सत्य की असीम शक्ति के जिस विश्वास का महल मैंने भीतर खड़ा किया था उसे खण्डहर होते देखना अति कष्टदायक है ... इस टूटन ने मुझे जैसे ध्वस्त कर दिया है ... मैं पूरी तरह से बिखरा हुआ महसूस करती हूँ ... ऐसे हर अवसर पर मैं उसी पंखे के नीचे जाकर खड़ी हो जाती हूँ ... तुम उस शोर को चीरते हुए निकल आते हो ... अपने सीने पर सिर रखकर मुझे रोने देते हो... तब तक रोने देते हो जब तक ये बिखराब आँखों के रास्ते बह नहीं जाता ... तुम सत्य से विश्वास के अमृत का एक प्याला उधार माँगते हो और एक एक बूँद मेरे भीतर उतार देते हो ... मैं जी उठती हूँ ... तुम धीरे से मुझे अपने सीने से अलग करते हो और अदृश्य हो जाते हो ।

याद है मुझे तुमने प्रशासनिक सेवा 2008की परीक्षा में पूरे भारत में बारहवाँ स्थान प्राप्त किया था और जब तुम अकादमी में दो साल की ट्रेनिंग पूरी करके आए थे तो तुम्हारी आँखों में एक सपना था और वो सपना हर पल तुम्हारे भीतर एक ऐसे जज़्बे का निर्माण करता था कि तुम सब जीर्ण - शीर्ण ढहा कर नवनिर्माण में जुट जाते थे , तुमने गरीब किसानों के हित में अनेक कार्यक्रम किए , उनका उनकी ताकत से परिचय कराया , उनके लिए शक्ति दूत बनकर आए ।

बस इसी समय तुम आँख की किरकिरी होने लगे ... तुम्हारा तबादला हुआ .. तुम रुके नहीं ... तुम्हारा फिर तबादला हुआ ... यह सिलसिला चलता रहा पर तुम तो एक जवान थे अपनी ड्यूटी पर तैनात ... तुम्हें तो रक्षा करनी थी ... तुम घुसपैठ कैसे करने दे सकते थे ?

तुमने मंत्री जी की तिजोरी तक पहुंचने वाले रास्ते में अवरोध उत्पन्न किया था ... उन्होंने प्यार से तुम्हें समझाने की कोशिश की थी पर तुम तो अपनी ड्यूटी पर तैनात एक जवान थे उनके बताए रास्ते पर नहीं चल सकते थे ।

वे बौखला उठे और तुम्हें यूँ पंखे से लटका गए।

मैं आज भी स्तब्ध हूं ... तुम लटकी हुई लाश नहीं थे तुम तो सदा से आवाज़ ही थे ,वही रहोगे ।

पूरे गाँव के किसान तड़प उठे हैं , असहायता उनके पूरे वजूद पर तारी रहती है , गाँव की हर माँ ने तुम्हारे रूप में अपना पुत्र खोया है और हर युवा खाली कोटरों जैसी आँखें लिए इधर-उधर डोलता नज़र आता है ।

अब तो गाँव वालों का जीवन हस्तक्षेप का चरम बनकर रह गया है ... हवाएँ भी प्रतिकूल प्रतीत होती हैं ....।

कभी-कभी उस कमरे से शोर की प्रतिध्वनि निकलती है और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगती है ... घर से निकल कर पूरे गाँव में फैल जाती है ... और फिर खेतों की ओर बढ़ने लगती है ... खेतों की बाढ़ों को तोड़ कर पगडंडी पर साधिकार चलती जाती है ... उसकी चाल धीमी होने लगती है ... एकाएक वह पगडंडी के दाईं ओर गहरे कुएँ की मुंडेर पर जाकर खड़ी हो जाती है ... फिर सरकने लगती है कुएँ के भीतर गहरे पानी में उतरने लगती है .... तुम भागते हुए आते दिखाई देते हो ... हाँफते - हाँफते ही घड़ी भर मुझे देखते हो और फिर उस कुएँ में उतर जाते हो ... उसे गहरे पानी में विलीन नहीं होने देते ...क्षण भर बाद ही उस प्रतिध्वनि की सुन्दर चमकीली सीपियाँ हाथ में लिए तुम मेरे सामने प्रकट हो जाते हो .... विजयी मुस्कान सब ओर फैल जाती है ...तुम मुझे अपनी बाहों में भर लेते हो ... फिर चुपचाप बड़े प्यार से एक सीपी मेरी कोख से चिपका देते हो ... शेष बची सीपियाँ उस खेत में लहलहाती सरसों की फ़सल पर चिपका देते हो ... चहुँ ओर सीपियों की फ़सल चमक उठती है ... तुम्हारी आँखों की कोरों में संतुष्टि का सागर लहराने लगता है ... तुम प्यार से मेरी गाल थपथपाते हो और चले जाते हो ।

एक बात और , माँ पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुकी है ... वह एक - एक तवे से उतरी गरम- गरम चपाती लिए घर भर में तुम्हें ढूँढती रहती है , तुम्हें पुकारती है ... तुम कहीं नहीं मिलते ...फिर विधवा कुम्हारिन के बेटे प्रताप को खिला कर आ जाती हैं ।

माँ की रोती आँखों को सारे चैनलों ने खूब दिखाया है ... तुम्हारी जघन्य और निर्मम हत्या को आत्महत्या कहकर प्रचारित करने का विरोध किया है... पर अब जाने क्यों एकाएक सबको साँप सूँघने लगा है ... मंत्री जी पुलिस द्वारा सारे केस की जाँच करवाना चाहते हैं जबकि हम सी०बी० आई० से जाँच चाहते हैं ... कोई हमारी मदद नहीं कर रहा है |

कुछ समय तक सब जोश में थे ... अब धीरे धीरे सबका जोश ठण्डा पड़ने लगा है ... पिताजी बस लगातार न्याय के लिए भटकते रहते हैं ...इस अन्याय के खिलाफ निरन्तर आवाज़ उठाने के आश्वासन अब झूठे वादे प्रतीत होने लगे हैं।मीडिया और स्वयंसेवी संस्थाएँ अब बचती प्रतीत होती हैं या शायद उनके लिए अब ये पुरानी खबर हो गई है।

कहीं ठीक पढ़ा था मैंने कि किसी भी खबर की उम्र टी०वी० और अखबार में ज्यादा से ज्यादा एक सप्ताह होती है ... पत्रिका में एक माह ... फेसबुक पर झलक भर... लेकिन उस परिवार के लिए जनम भर ।

तुम अब भी बालकनी से अन्दर तक मेरे साथ ही आते हो ... बार- बार मुझे कहते हो जवान की शहादत शोक का सबब नहीं होती यही शहादतें दुश्मनों के कफ़न का कपड़ा बुनती हैं ... तुम लगातार मेरे पीछे पीछे चलते हुए बोलते रहते हो पर मैं तुम्हारे इस कथन को आत्मसात नहीं कर पाती हूँ ।

हाँ लेकिन कोई है जो इस कथन को सुनता भी है , गुनता भी है और तुम्हारी इच्छानुसार आत्मसात भी करता है ... वो कोई और नहीं तुम ही हो , तुम्हीं हो ... मेरे भीतर छ: महीने की नन्ही सी उम्र में तुमने जीवन के सबसे बड़े सत्य को अपनी आत्मा में उतार लिया है ... ।

मैंने तुम्हारी सुरक्षा की कसम ली है ... इस दुनिया में कोई भी तुम तक नहीं पहुँच पाएगा ... निश्चित अवधि के बाद तुम मेरे भीतर से बाहर आओगे ... फिर से सीमा पर तैनात हो जाओगे .... वो लोग आँखें फाड़े देखते रहेंगे ... तुम्हारे पुनर्जन्म के रहस्य को नहीं समझ पाएँगे.... ।

तुम एक देवदूत की शक्ल अख्तियार कर लोगे ... तुम्हारी अपार असीम शक्तियों के आगे वे बौने प्रतीत होंगे ... वो फिर बौखला उठेंगे पर इस बार तुम सचेत होगे ... वो तुम्हें पंखे पर नहीं लटका पाएँगे । तुम फिर से उनकी तिजोरियों के रास्ते में अवरोध उत्पन्न करोगे पर इस बार वे समझ नहीं पाएँगे क्या करें ... क्योंकि वो तुम्हें नहीं पहचान पाएँगे ।

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परिचय

नाम     -     प्रतिभा
शिक्षा     -    एम० ए०  , एम० फिल०
कृतियाँ    -     तीसरा स्वर (कहानी संग्रह )
अभयदान (कहानी संग्रह )
  " तीसरा स्वर ” पर हरियाणा
साहित्य अकादमी की ओर
से प्रथम पुरस्कार । दैनिक
ट्रिब्यून चण्डीगढ़ तथा हिंदी
अकादमी दिल्ली से कहानियाँ
पुरस्कृत । परिकथा , कथाक्रम , कथा समय , हंस , इन्द्रप्रस्थ भारती

में कहानियाँ प्रकाशित

सम्पर्क      -    

pratibha.kmr26@gmail.com

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