गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

लघुकथा // भविष्य // श्रद्धा मिश्रा

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नंदनी आज खाने में क्या है? जोरों की भूख लगी है। नमन ने कुतुहलवश पूछा।
तुम्हारी ही पसंद की सारी चीजें हैं नमन, नंदनी ने कहा।
खाना खाते ही नमन ने कहा वाह! मजा आ गया। नंदनी मैंने पहले भी कहा अभी भी कहूँगा तुम्हारे हाथों में जादू है। जो भी बनाती हो लाजवाब,जो भी खाए बस खाता जाए।
नंदनी ने बीच में टोकते हुए कहा नमन सोचती हूँ टिफ़िन का काम कर लूँ। हर साल कितने नए बच्चे आते हैं यहाँ पढ़ने जो खाना नहीं बना पाते उन्हें भी घर जैसा खाना मिलेगा और उस के लिए बाहर भी नहीं जाना पड़ेगा और मेरा हुनर भी बेकार नहीं होगा।

हर बार की तरह नमन हूं हूं करके हाथ धो के बेडरूम में चला गया। परी को गोद में उठाकर उसके साथ खेलने लगा।

नंदनी को पता था कि नमन इस बात में कोई इंट्रेस्ट नहीं लेंगे। फिर भी उसने अपनी बात बोल दी। ये नमन का आज का नहीं है जब भी नंदनी उससे घर के बाहर जाकर या घर मे ही रहकर कोई काम करने की बात करती उसका यही रवैया होता था।

खैर, इसी तरह दिन बीतते गए।

एक दिन अचानक नमन ने नंदनी से कहा नंदनी मैं सोचता हूं तुम्हें अपना हुनर घर में ही आजमाना नहीं चाहिए। नंदनी को एक बार को लगा कि उसने जो सुना वो नमन ने ही कहा है या कि उसके ही दिल की आवाज है।

1 मिनट तक उसने नमन को देखा फिर नमन ने कहा ऐसे क्यों देख रही हो मैं सच में चाहता हूँ कि तुम अपने हुनर से अपनी पहचान बनाओ।

नंदनी ने पूछा 5 सालों से मैं ये पूछती रही कहती रही आज अचानक क्या हुआ कि आप की सोच बदल गयी।

नमन ने कहा नंदनी आज रश्मि ऑफिस में आई थी। उसके बारे में सुना तो अंदर तक हिल गया।

रश्मि कौन है? नंदनी ने पूछा।

हमारे ऑफिस में जो चपरासी है मंगल उसकी बीवी है।
उसके माता पिता ने उसे बहुत कम पढ़ाया लिखाया और छोटी उम्र में ही शादी कर दी। मंगल सिंह ने उसे पढ़ाया लिखाया। और उसे पुलिस की नौकरी मिल गयी है। दोनों खुश हैं। अगर वो इतनी छोटी सी नौकरी करके इतनी बड़ी सोच रखता है तो मैं क्यों नहीं कर सकता नंदनी। मैं क्यों तुम्हारे हुनर को दबाऊं।  आखिर मैं बदलूंगा तभी तो कल अपनी बेटी के लिए बेहतर भविष्य की और बेहतरीन समाज पाऊँगा।

नंदनी की आंखों में गर्व था, पता नहीं किसके लिए मंगल सिंह के लिए या अपनी बेटी के आजाद भविष्य के लिए।

श्रद्धा मिश्रा

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