शनिवार, 9 दिसंबर 2017

बालकथा // खुशी के आंसू // ‘शशांक मिश्र भारती


कोमल एक गरीब मां-बाप का बेटा था. किसी तरह मेहनत मजदूरी करके सभी का गुजारा चलता था। कभी-कभी काम न मिलने पर चूल्हा एक बार ही जलता। उनके पास इतने पैसे नहीं हो पाते; कि कोमल को उसकी पसन्द के कपड़े दिलवा पाते। फिर भी वह सन्तुष्ट था। कोई शिकायत न थी।

कोमल के साथी जब स्कूल जाने लगे; तो उसने भी अपनी मां से कहा,

-‘‘मां! मेरे साथ के सभी दीपक, रमेश, सूरज, दीपा, हेमा, गीता आदि स्कूल जाने लगे हैं। मैं भी जाऊंगा,’

बेटा, तुम्हारे पास स्कूल डेªस और पढ़ने के लिए किताबें कहां से आयेंगी। घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चलता है। केशव लाला का ही कई-कई महीने का उधार हो जाता है। उसकी मां ने समझाते हुए कहा।

-मां, मैं अपना खर्च अपने आप उठाऊंगा। मेहनत-मजदूरी कर लूंगा। छोटा हूं तो क्या हुआ। अपने भर को पैदा कर ही लूंगा।

बेटा, यह उम्र कहीं काम करने की होती है। खैर शाम को तेरे पापा से पूछती हूँ। मां ने कहा,

पूरी बात पता लगने पर कोमल के पापा तैयार हो गए। कोमल ने समीप बह रही नदी से बजरी और रेत निकालने के लिए ठेकेदार से बात की। उसने कुछ रुपये एडवांस मिले रुपयों से कोमल ने अपने स्कूल की डेªस और कुछ किताबें खरीद ली।

अगले दिन सुबह-सुबह ही आस-पास के बच्चों को खुशखबरी दे डाली।

-दीपक, सुरेश, गीता, आओ! देखो, मैंने कितने अच्छे कपड़े बनवाये हैं। स्कूल के लिए किताबें भी खरीद ली हैं। मैं आज से तुम लोगों के साथ स्कूल जाऊंगा,

कोमल का उसके पापा ने गांव के स्कूल में दाखिला करवा दिया। वह मन लगाकर मेहनत से पढ़ने लगा। स्कूल से छुट्टी के बाद ठेकेदार के यहां रेता-बजरी निकालता ।अरे! कोमल, तुम इतनी कम उम्र में ऐसी लगन से काम करते हो ? क्या बात है। ठेकेदार ने पूछा,

कुछ नहीं, ऐसे ही कोमल ने ठेकेदार की बात का जवाब देते हुए कहा,

‘नहीं, बताओ तो हम भी जाने।’

मैं पढ़लिखकर बड़ा बनना चाहता हूँ। ताकि मेरे माता-पिता को मेहनत-मजदूरी न करनी पड़े। मेरे छोटे भाई-बहन अच्छे से अच्छे स्कूल में पढ़ें, कोमल ने ठेकेदार की जिज्ञासा को शान्त करते हुए कहा। ठेकेदार पर कोमल की बातों का गहरा असर पड़ा-

‘‘बेटा, मुझे तुम्हारे विचारों को जान कर बहुत प्रसन्नता हुई। आज से तुम्हें मेरे यहां रेता-बजरी निकालने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई का पूरा खर्च उठाऊंगा तथा हेड मास्टर से कहकर छात्रवृत्ति भी दिलवाऊंगा।तुम बस मेहनत से मन लगाकर अपनी पढ़ाई करते रहो।’’

ठेकेदार के मुँह से ऐसा सुनकर कोमल की आंखें खुशी से छल-छला उठीं। वह उसके पैरों में लिपट कर रो पड़ा।

-नहीं! नहीं!! पैरों में नहीं गिरते।

तुम्हारी बात ने तो मुझे बहुत प्रभावित कर दिया है। काश! ऐसी भावना इस देश के प्रत्येक बालक में पैदा हो पाती। तो कैसा रहता..........।

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शशांक मिश्र भारती सम्पादक देवसुधा हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर -242401 उ0प्र0


ईमेलः- shashank.misra73@rediffmail.com/devsudha2008@gmail.com

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