व्यंग्य // बुढापे के मज़े // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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वह अपनी कोच पर मसनद लगाए बैठे थे। पैर फैला लिए थे। मोज़े उतार दिए थे। पत्नी से रहा नहीं गया। बोली, इतना जाड़ा है पैर फैलाए बैठे हो, मोज़े भी उतार दिए हैं, ठण्ड खा जाओगे। लेकिन वे माने नहीं|

वैसे ही बैठे रहे। तभी कमरे में एक युवक दाखिल हुआ। घुसते ही उसने उनके चरण स्पर्श किए। युवक को उन्होंने आशीर्वाद दिया। खुश रहो कहकर, पत्नी की ओर मुस्कराकर देखा और आगुन्तुक व्यक्ति से कहा, ये तुम्हारी आंटी हैं, पैर छुओ। आंटी का भी चरण स्पर्श किया गया।

बुढापे के बस यही मज़े हैं। जो आए चरणस्पर्श करके ही जाए। पैर छुवाने के लिए तैयार रहना होता है। पैर फैला कर, मोज़े उतार कर। आशीर्वाद कितना ही दो कभी कम नही होता। कोई रुपया-पैसा थोड़े ही है जो खर्च हो जाए ! बुजुर्गों का आशीर्वाद बड़ा कीमती होता है। एक बुज़ुर्ग का ही कलेजा है जो उसे उदारता पूर्वक लुटा सकता है। बुजुर्गों के आगे तो सब बच्चे ही हैं। आशीर्वाद माँगते रहते हैं। आशीर्वाद देने में जो अलौकिक आनंद है उसे गैर-बुज़ुर्ग भला क्या समझें !

उस रोज़ उन्हें मैंने चश्मा लगाए देखा। अरे, आपके चश्मा लग गया ! “लगना ही था। इधर कुछ दिन से कुछ कम दिखाई देने लग गया था। अब बुढापा तो अपनी कीमत वसूल कर ही लेता है। पर चिकित्सा ने अब बड़ी उन्नति कर ली है। आँखें कमज़ोर हो जाएं तो चश्मा लगा लें, कान से कम सुनाई देने लगे तो कान की मशीन लगा लें, दांत झड जाएं तो नए लगवा लें। यहाँ तक कि घुटने में दर्द होने लगे तो उसे भी बदलवा लें| मैंने तो सब करवा रखा है। सब इन्द्रियाँ फिर नई की नई हो गईं हैं। बड़े मज़े में हूँ।”

सरकार ने बुजुर्गों को अच्छी-खासी छूट दे रखी है। यात्रा के लिए किराए में छूट, इनकम-टैक्स में छूट, समय समय पर पेंशिन में बूढ़े होने का विशेष भाता, इत्यादि। पर बुजुर्गों को, सिर्फ बुज़ुर्ग होने के नाते, एक छूट और भी मिली हुई है। कवि को शिकायत थी कि सुदर लड़कियां बुजुर्गों को ‘बाबा कहि कहि’ उनसे मुंह फेर लेतीं है। लेकिन कवि यह क्यों भूल जाता है कि बुजुर्गों को ही यह छूट मिली हुई है कि वे किसी भी सुन्दर लड़की को आशीर्वाद देने के बहाने उसके सिर और कंधे पर बिला-झिझक हाथ फेर सकें। बुज़ुर्गी के बड़े मज़े हैं|

आप ज़रा गौर फरमाइए। बच्चों का बचपन कोई नहीं छीनना चाहता। युवक-युवतियों का यौवन बना रहे, यह भी सभी चाहते हैं। लेकिन बुजुर्गों का बुढापा कोई नहीं चाहता। यहाँ तक कि स्वयं बुज़ुर्ग लोग भी इसे नहीं चाहते। हमेशा इसी फिराक में रहते हैं कि बुढापे को कैसे रोका जाए। तरह तरह के नुस्ख़े आज़माते हैं। योगा करते हैं, आसन लगाते हैं, प्राणायाम करते हैं। चिकित्साशास्त्र भी इसी कोशिश में लगा हुआ है कि बुढापे पर किस तरह शिकंजा कसा जाए और उम्र बढ़ाई जा सके। सच, बुढापे के बड़े मज़े हैं। हर किसी को इसकी फ़िक्र है कि बुढापा, बुढापा न रहे। अमेरिका में खासतौर पर इस दिशा में शोध जोर-शोर से हो रहा है। वहां दवा बनाने वाली बड़ी बड़ी कम्पनियां इस बात पर रिसर्च कर रही हैं कि आदमी हमेशा युवा बना रहे। जवानी एक बार आए तो वापस जाने का नाम न ले। अगर कहीं ऐसा संभव हो पाया तो बुढापा आएगा ही नहीं, लोग जवानी में ही मर जाएंगे ! कितनी अजीब बात होगी !! भरी जवानी में लोग मरने लगेंगे। यहाँ भारत में बुज़ुर्ग लोग यह सोच सोच कर खूब मज़े ले रहे हैं।

बुजुर्गों को यह अधिकार मिला हुआ है कि वे गाहे-बगाहे युवक युवतियों को चाही-अनचाही हिदायतें देते रहें, यह करो, यह न करो। युवक इन नसीहतों को यदि सम्मानपूर्वक सुन भी लें तो बुजुर्गों को इससे बड़ी तारो-ताज़गी महसूस होती है। हिदायतों का कोई पालन करे या न करे यह बात अलहदा है। लेकिन बुज़ुर्ग हमेशा याद दिलाते रहते हैं कि जो भी वे बताते हैं वह कोई किताबी बात नहीं है, वर्षों के तजुर्बे से वे बोल रहे हैं। ऐसा हर कोई, जो बुज़ुर्ग नहीं है. नहीं कह सकता। बुजुर्गों के बड़े मज़े हैं।

अगर आप एक बुज़ुर्ग लेखक हैं जिसने अपनी रचनाओं के जारिए थोडा-बहुत नाम कमा लिया है, तो सच मानिए आपको कोई न कोई सरकारी-गैरसरकारी पुरस्कार मिल ही जाएगा। क्या पता भारतरत्न ही मिल जाए ! ऐसे पुरस्कार हर किसी को नहीं मिलते। केवल उन बुद्धिजीवियों, अफसरों, राजनेताओं या उद्योग पतियों को ही मिल पाते हैं जो बूढ़े हो चुके हैं। कभी कभी तो मरने की दहलीज़ पर ही सम्मानित किया जाता है। ऐसा सम्मान प्राप्त कर मरने के बाद भी उनके बड़े मज़े रहते हैं। जगह जगह उनकी पुण्य स्मृति में सभाएं होती हैं और आयोजन किए जाते हैं।

अब बुढापे से डरने की कोई वजह नहीं रही है। उल्टे बुज़ुर्ग लोग ही युवकों को डराते देखे गए हैं। डरो, एक दिन तुमको भी बूढा होना है।

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--डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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1 टिप्पणी "व्यंग्य // बुढापे के मज़े // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. बुढापे के मजे अवश्य हैं परन्तु वैज्ञानिक इस मजे को मिटाने की फिक्र में लगे हुये हैं। वर्मा जी की पैनी निगाह चारों तरफ घूमती रहती है। उन्हें चिन्ता है कि कहीं वैज्ञानिक सफल हुये तो लोग न आशीर्वाद दे पायेंगे और न नसीहत, उल्टे भरी जवानी में ही मरने लगेंगे। फिर बुढापे के मजे कैसे मिल पायेंगे। उम्दा व्यंग्य के लिए बधाई‌ ।

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