मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

दान एवं उससे खुशी का दर्शन // मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

श्रीराम

दान एवं उससे खुशी का दर्शन

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मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

''मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति''

सदा-सदा के लिये जन्म मरण के चक्र एवं बंधन से मुक्त होना, अर्थात् भगत्वप्राप्ति है। भारतीय धर्मशास्त्र के ग्रन्थों में इसके उपाय चारों युगों में वर्णित हैं। चारों युगों में सफल एवं सुखीमानव जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु धर्मशास्त्र के राजाषि मनुजी ने चारों ही युगों के भिन्न-भिन्न चार साधन बताये है :-

तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते ।

द्वापरे यज्ञमेवाहुदनिमेकं कलौ युगे ।।

सत्ययुग मे तप ,त्रेता में ज्ञान , द्वापर में यज्ञ और कलियुग में मात्र एक दान ही मनुष्य के कल्याण का परम साधन है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने दान की महिमा का वर्णन बहुत ही अल्प शब्दों में अत्यन्त ही प्रभावशाली ढंग से बताया है :-

प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान ।

जेन-केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान ।।

दान से ही मनुष्य का कल्याण एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है किन्तु दान क्या किया जावें ? वास्तव में दान के अनेक रूप हैं । कुछ में तो प्रत्यक्ष दान ऐसे हैं , जिसमें द्रव्य , (धन का) का विनियोग अर्थात् अर्जित धन का त्याग करना पड़ता है जैसे-अन्नदान,जलदान,वस्त्रदान, भूमिदान, गृहदान, स्वर्णदान,शय्यादान, तुलादान पिण्डदान, आरोग्यदान, गौदान, जलदान आदि ।

दान पर विचार करने पर कुछ दान ऐसे भी हैं जिनके लिए हमे किसी भी प्रकार का धन व्यय नही करना पड़ता हैं। , इस प्रकार दानों का भी कम महत्व नही हैं जैसे-मधुरवचनों का दान , प्रेम का दान क्योंकि संसार में सबके प्रति प्रेम रखना ही एक प्रकार से परमात्मा के प्रति प्रेम है । आश्वासनदान दान का दान , निराश व्यक्ति के जीवन में नकारात्मकता से सकारात्मकता भर देता है । आजीविकादान व्यक्ति के परिवार के पालन-पोषण की व्यवस्था करता है । छायादान में वृक्षारोपण कर छायादान ही नहीं अपितु पर्यावरण की रक्षा का दान भी निर्मित हो जाता है । श्रमदान एवं भूदान के महत्व का प्रतिपादन श्रद्धेय विनोबाजी की शिक्षा से भरा हैं । हमारे आस-पास के वृद्ध या अशक्त व्यक्ति के छोटे-मोटे कार्य एवं बाजार से सामान लेकर कर कर सकते है जो कि दान की ही श्रेणी में आते है । दानदाता का हृदय पवित्र हो तो उसकी खुशी दुगनी हो जाती है ।

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आधुनिक काल में शरीर के अंगों के दान का महत्व कम नही है । मानव शरीर '' शरीरं व्याधिमन्दिरम् '' हैं । आज मानव जीवन कुछ असाध्य रोगों से ग्रस्त है । अतः रक्त दान , गुर्दा (किडनी) दान, नेत्रदान, यकृत (लीवर) दान कर इनका प्रत्यारोपण हो रहा है । कई लोग अपने जीवन काल में चिकित्साविज्ञान के विद्यार्थियों को शरीर रचना ज्ञान के लिये मृत्युपश्चात शरीर दान वसीयत कर दे जाते है । उनके शरीर से हृदय , मज्जा, एवं अस्थी का भी दूसरे के जीवन को बचाने में काम आ रही है ।

इन दानों के अतिरिक्त समयदान, क्षमादान, सम्मानदान, विद्यादान, पुण्यदान, जपदान, भक्तिदान, आशिष्दान, आश्रयदान, गौदान, वस्त्रदान, कन्यादान, अभयदान, आदि है । संक्षिप्त में हम शंकरजी के समान तो दानी नही बन सकते है किन्तु हम कम से कम हरिशचंद्र , राजाबालि, कर्ण , युधिष्ठिर , एवं दधीची, का दान स्मरण कर प्रेरणा प्राप्त कर सकते है । इसलिये अर्थववेद में बताया है -

शतहस्त समाहर सहस्त्रहस्त सं किर । 3/24/5

सैकड़ो हाथों से इकटठ करों और हजारों हाथों से बाँटों

मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

''मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति''

व्यास नगर

ऋषिनगर विस्तार उज्जैन (म.प्र.)

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