मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

व्यंग्य // अंडे का फंडा // डा. सुरेन्द्र वर्मा

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यों अंडे पर लेख लिखने का कोई इरादा नहीं था लेकिन जब से देसी-अंडा बाज़ार से करीब क़रीब गायब हो गया है, मेरा स्वदेश प्रेम कुछ अधिक ही जाग्रत हो गया है और मैं हर देसी चीज़ से इंतहा मुहब्बत करने लगा हूँ। इधर अंडा सहित कई चीजों में ज़बरदस्त बदलाव आया है। लीडरान सेकुलर से फिरकापरस्त हो गए हैं, कुत्ते बेवफा हो गए हैं और अंडे देशी से ‘फार्मी’ बन गए हैं। अपने लाभ के लिए अंडा अवसरानुसार दल-बदल में भी पारंगत हो गया है। अपने को कभी वह शाकाहारी भोजन में सम्मिलित कर लेता है तो कभी मांसाहारी खेमें में अपनी पैठ बना लेता है। मांसाहारियों के लिए यह शाकाहार नहीं है किन्तु शाकाहारी इसे आलू समझ कर इसका सेवन करते हैं। कभी गोश्त तो कभी आलू बन जाता है, अंडा। गज़ब का अवसरवादी है। पर अण्डों के बिना काम भी तो नहीं चलता। चाहे आपकी निजी सेहत का सवाल हो या किसी राजनैतिक पार्टी की सेहत का प्रश्न हो, अंडे हरेक के लिए मुफीद रहे हैं। शुद्धतावादी बेशक अण्डों से बचकर रहते हैं लेकिन ज़ाहिर है, अपनी ही कीमत पर। जो अंडा पसंद नहीं करते, बैगन से अपना काम चलाते हैं। दोनों में लुढ़कने की अपार क्षमता है।

आदमी अंडा खाता तो है ही, उससे खेलता भी है। खेलने के किए उसे लुढ़कने वाली चीजें विशेषकर पसंद हैं। गेंद एक ऐसी ही वस्तु है। अधिकतर खेलों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। ईसाई पर्व, ईस्टर, पर अंडे का खाने और खेलने के लिए खूब सेवन होता है। अंडे के खेल में प्राय: मैदान में बच्चों को एक पंक्ति में खड़ा करके उन्हें एक निश्चित दूरी तक एक करछी या चमचा में एक अंडे को रखकर भागना होता है। अधिकतर बच्चे पूरा फासला तय नहीं कर पाते। करछी से अंडा पहले ही लुढ़क जाता है।

ईस्टर ईसाई धर्मावलम्बियों का एक बड़ा और महत्वपूर्ण पर्व है। पर्व का यह अंग्रेज़ी नाम, ईस्टर, बसंत की देवी ‘ओस्टअर’ से ग्रहण किया गया है। बसंत ऋतु में पड़ने व़ाला यह पर्व उल्लास लेकर आता है। ईसाई मान्यता के अनुसार ईसामसीह इसी दिन पुनर्जीवित हुए थे। वसंत ऋतु में वैसे भी प्रकृति मानों पुनर्जीवित हो उठती है। इस पर्व पर मसीही लोग एक दूसरे को रंग-बिरंगे अंडे, और अंडाकार वस्तुएं सजाकर उपहार स्वरूप प्रदान करते हैं। वे अंडे को आशा और जीवन के प्रतीक रूप में ग्रहण करते हैं। आखिर अंडे से ही तो जीवन की आशा की जा सकती है।

हमारी पृथ्वी का मानचित्र अंडाकार है। आदमी का चेहरा भी गोल-गोल सा, अंडाकार, ही होता है। क्या पता शायद इसीलिए, आदमी भी लुढ़कने में बड़ा निपुण होता है। आदमी और अंडे में यह कमाल की समानता है। आराम करने के लिए आदमी बिस्तर पर तो लुढ़कता ही है, लाभ का अवसर भुनाने अक्सर एक पार्टी से दूसरी पार्टी में भी लुढ़क जाता है। सरकार में सम्मिलित विजातीय अंडे भी ठीक ऐसा ही तो व्यवहार करते हैं।

लेकिन अंडे की एक खूबी है। वह मिलावट में विश्वास नहीं करता। मुर्गी का अंडा मुर्गी का ही रहेगा, बत्तक का नहीं हो सकता। इस मायने में अंडा दूध से बेहतर है। गाय के दूध में भैस का दूध और किसी के भी दूध में दूध-पाउडर आसानी से मिल जाता है। सच तो यह है की हम किसका दूध पीते हैं हमें मालूम ही नही पड़ पाता।

कई जीव बच्चे पैदा न करके अंडे पैदा करते हैं। लेकिन अंडे हमेशा बच्चे ही पैदा करते हैं। आदमी क्योंकि मुर्गी खाता है। उसके अंडे भी खा जाता है। कुछ अपवाद भले ही हों। जैसे आदमी मछली खाता है, लेकिन मछली के अंडे नहीं खाता। बड़ी अजीब बात है।

एक थी पत्नी, ठेठ हिन्दुस्तानी। उसका एक पति था, वह भी ठेठ हिन्दुस्तानी। पति जो कहता पत्नी वही करती। बैठ जाओ तो वह बैठ जाती। खड़ी हो जाओ तो वह खड़ी हो जाती। ऐसे ही एक पति-पत्नी का एक किस्सा मशहूर है। सुबह नाश्ते में पति ने एक बार अंडे की फरमाइश की। पत्नी अंडा फ्राई करके, प्लेट में ले आई। नकचढ़ा पति बोला, अजीब औरत हो। मैं उबला अंडा खाना चाहता था और तुम फ्राई करते ले आईं। पति ने दूसरे दिन भी अंडे की फरमाइश की। इस बार पत्नी अंडा उबाल कर ले आई। पति तो पति ठहरा। फिर भड़क गया। बोला आज जब मैं फ्राई खाना चाहता था तुम उबाल कर ले आईं। तीसरी बार पत्नी दो प्लेटों में, एक में फ्राई और दूसरे में उबला अंडा ले आई। पति बोला, अरे तुमने यह क्या कर डाला ? जिस अंडे को तुम्हें फ्राई करना था उसे तुमने उबाल दिया और जिसे उबालना था उसे फ्राई कर दिया। कितनी मूर्ख और काहिल हो तुम ! कहानी का पाठ बिलकुल साफ़ है। हर अंडे की अलग अलग तासीर और खूबी होती है, और इसे सिर्फ पति ही जान पाता है।

वैसे अंडे कई तरह के होते हैं। बहुत छोटे छोटे अण्डों से लेकर बहुत बड़े,विशाल अंडे भी होते हैं। हाथी के सामान एक विशालकाय चिड़िया जिसका वंश अब समाप्त हो चुका है, हाल ही में पैरिस के पुराशिल्पियों के हाथ लग गया था। यह बेशकीमती अंडा जब नीलाम हुआ तो उसकी बोली अट्ठानवे हज़ार डालर तक लगाई गई। एक अनमोल चीज़ जो पन्द्रह सौ वर्षों से विलुप्त थी ऊंचे दाम पर बिक गयी और पैरिस का नैचुरल हिस्ट्री म्यूजियम टापता रह गया।

पुनर्जीवन में विशवास के रूप में अंडा योरप में कलाकारों का भी एक प्रिय ‘मोटीफ’ रहा हैं। अतियथार्थ- वादी चित्रकार सल्वाडोर डाली ने अपने नाम की जो ‘संग्रहालय रंगशाला’ बनवाई थी, उसके शिखर पर उसने एक दो नहीं पूरे, एक कम बीस, फैब्रिक ग्लास के विशाल अंडे स्थापित किए थे। संग्रहालय में अंडे को चित्रित करतीं कई रचनाएं भी वहां संग्रहीत हैं। भारत में अंडा इस कलात्मक ऊंचाई तक अभी तक नहीं पहुँच पाया है, चित्र प्रेमियों को इसका मलाल है।

अंडा समस्त जीवन और जीवन की आशा का स्रोत माना गया है। लेकिन स्वयं वह शून्य है, जीरो है। इस शून्य का आविष्कार भारतीय मनीषा ने किया। उसी की यह देन है। किसी भी अंक के बाद यदि इसे लगा दिया जाए तो यह अंक के मूल्य को दस गुणित कर देता है। लेकिन अपने आप में यह मूल्यहीन है। कमजोर बच्चों को हमेशा डर रहता है कि कहीं उन्हें परिक्षा में यह अंडा पकड़ा न दिया जाए !

अंडा भोजन है, अंडा खेल है। लुढकन है अंडा। आशा और पुनर्जीवन का प्रतीक है। कलाकारों का ‘मोटिफ’ है। अंडा शून्य है।

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--डा.सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड,

इलाहाबाद – २२११००१

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